इज़रायल में युद्ध-विराम को लेकर नेतन्याहू के खिलाफ ज़बरदस्त प्रदर्शन

इज़रायल में युद्ध-विराम को लेकर नेतन्याहू के खिलाफ ज़बरदस्त प्रदर्शन

इज़रायल में प्रधानमंत्री नेतन्याहू की सरकार के खिलाफ जनाक्रोश बढ़ता जा रहा है। रविवार को राजधानी तेल अवीव में हजारों की संख्या में प्रदर्शनकारियों ने सड़कों पर उतरकर मौजूदा युद्ध नीति, बंधकों की अनदेखी और हमास के साथ बातचीत में देरी के खिलाफ जोरदार प्रदर्शन किया। यह विरोध देश के रक्षा मुख्यालय ‘किरिया’ के सामने हुआ, जो कि इज़रायली सेना की रणनीतिक गतिविधियों का केंद्र है।

प्रदर्शनकारियों के हाथों में तख्तियां थीं जिन पर लिखा था – “युद्ध का कोई विजेता नहीं होता” और “बंधकों को वापस लाओ”। इस जनसैलाब ने सरकार से यह स्पष्ट मांग की कि, वह युद्ध को जल्द खत्म करे और ग़ाज़ा में हमास के क़ब्ज़े में मौजूद दर्जनों इज़रायली बंधकों की सुरक्षित रिहाई के लिए तत्काल और गंभीर प्रयास करे।

प्रदर्शन की पृष्ठभूमि में यह तथ्य भी महत्वपूर्ण है कि इज़रायल और हमास के बीच चल रही जंग को कई महीने बीत चुके हैं, लेकिन अब तक ना तो कोई निर्णायक सैन्य सफलता हासिल हुई है, और ना ही बंधकों की रिहाई संभव हो सकी है। ऐसे में आम जनता में असंतोष गहराता जा रहा है, और यह आरोप लगाया जा रहा है कि नेतन्याहू सरकार युद्ध को अनावश्यक रूप से लंबा खींच रही है।

इस बीच, इज़रायली मीडिया ने रिपोर्ट किया है कि, नेतन्याहू ने ग़ाज़ा में संभावित युद्ध-विराम पर बातचीत के सिलसिले में अपने दो सख्तपंथी गठबंधन सहयोगियों – इतामार बेन गविर और बेज़ालल स्मोट्रिच – को विशेष चर्चा के लिए तलब किया है। ये दोनों नेता युद्ध के समर्थन में माने जाते हैं, और ऐसी किसी भी डील का विरोध कर सकते हैं जिसमें हमास के साथ समझौता किया जाए।

विशेषज्ञों का मानना है कि नेतन्याहू के लिए यह एक राजनीतिक दुविधा बन चुकी है। एक ओर देश के भीतर बंधकों के परिजन और आम नागरिक सरकार पर दबाव बना रहे हैं कि, युद्ध समाप्त किया जाए, वहीं दूसरी ओर सरकार के कट्टर सहयोगी युद्ध को जारी रखने की वकालत कर रहे हैं।

यह विरोध केवल एक दिन की घटना नहीं है। दरअसल, अक्टूबर 2023 में युद्ध की शुरुआत के बाद से ही नेतन्याहू की युद्धनीति को लेकर समय-समय पर देशभर में प्रदर्शन होते रहे हैं। लेकिन हाल के दिनों में जैसे-जैसे बंधकों की रिहाई की उम्मीदें धुंधली होती जा रही हैं, वैसे-वैसे जनता का गुस्सा खुलकर सामने आने लगा है।

अब देखना यह है कि नेतन्याहू सरकार इस जनदबाव के आगे झुकती है या फिर अपने गठबंधन को बचाने के लिए युद्ध की राह पर आगे बढ़ती है। इस मोड़ पर इज़रायल की आंतरिक राजनीति, जनता की भावना और क्षेत्रीय हालात – तीनों ही निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं।

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