इज़रायल के वहशियाना हमलों ने साबित कर दिया कि, उसके रहते हुए मिडिल ईस्ट में शांति नहीं आ सकती

इज़रायल के वहशियाना हमलों ने साबित कर दिया कि, उसके रहते हुए मिडिल ईस्ट में शांति नहीं आ सकती

मिडिल ईस्ट में शांति की हर उम्मीद को कल एक बार फिर उस समय कुचल दिया गया जब इज़रायल ने लेबनान में घोषित युद्धविराम (सीज़फायर) का खुलेआम उल्लंघन करते हुए भीषण हमले किए। इन हमलों में 300 से अधिक निर्दोष आम नागरिकों की मौत और 1000 से अधिक लोगों के घायल होने की खबरें सामने आई हैं। यह घटना केवल एक सैन्य कार्रवाई नहीं, बल्कि एक स्पष्ट युद्ध अपराध है, जिसकी जितनी भी निंदा की जाए, कम है।

सीज़फायर का मतलब होता है—हिंसा को रोकना, लोगों को राहत देना और शांति की दिशा में एक कदम बढ़ाना। लेकिन इज़रायल ने इस समझौते को पूरी तरह से दरकिनार करते हुए जिस तरह लेबनान की धरती पर बमबारी की, वह अंतरराष्ट्रीय कानूनों और मानवीय मूल्यों दोनों का घोर उल्लंघन है। मासूम बच्चों, महिलाओं और आम नागरिकों को निशाना बनाना किसी भी परिस्थिति में जायज़ नहीं ठहराया जा सकता।

सबसे गंभीर बात यह है कि यह कोई आकस्मिक घटना नहीं लगती, बल्कि एक सुनियोजित आक्रामक कार्रवाई प्रतीत होती है। युद्धविराम लागू होने के बावजूद हमला करना इस बात का संकेत है कि इज़रायल शांति प्रक्रिया को गंभीरता से लेने के बजाय अपनी सैन्य ताकत के दम पर हालात को नियंत्रित करना चाहता है। इस तरह की नीति न केवल क्षेत्रीय अस्थिरता को बढ़ाती है, बल्कि आने वाले समय में और बड़े संघर्ष का कारण बन सकती है।

लेबनान में हुए इन हमलों ने एक बार फिर यह उजागर कर दिया है कि अंतरराष्ट्रीय नियमों की अवहेलना करते हुए किस तरह आम लोगों की ज़िंदगी को दांव पर लगाया जा रहा है। जिन परिवारों ने अपने प्रियजनों को खोया है, उनके लिए यह केवल एक खबर नहीं, बल्कि एक अपूरणीय त्रासदी है। अस्पतालों में भरे घायल, तबाह घर और बिखरी ज़िंदगियाँ इस बात की गवाही दे रही हैं कि यह हमला कितना विनाशकारी था।

नेतन्याहू प्रशासन ने सीज़फ़ायर (युद्धविराम) का जानबूझकर उल्लंघन किया है—ऐसा आरोप लगातार सामने आ रहा है। कई विश्लेषकों का मानना है कि यह केवल एक आकस्मिक या सीमित घटना नहीं, बल्कि एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा हो सकता है। वहीं हक़ीक़त यह भी बताई जाती है कि नेतन्याहू स्वयं युद्धविराम के पक्ष में नहीं दिखते, क्योंकि जैसे ही युद्ध समाप्त होगा, इज़रायल के भीतर उनके खिलाफ़ चल रहे भ्रष्टाचार के मामलों की फ़ाइलें दोबारा खुल सकती हैं और उन पर राजनीतिक तथा कानूनी दबाव बढ़ सकता है।

इसी कारण, आलोचकों के अनुसार, वे देश को लगातार युद्ध की स्थिति में बनाए रखना चाहते हैं, ताकि आंतरिक मुद्दों से ध्यान हटाकर राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर अपनी राजनीतिक स्थिति को मज़बूत किया जा सके। इस पूरी परिस्थिति में इज़रायल की आंतरिक राजनीति और बाहरी सैन्य कार्रवाई के बीच गहरा संबंध दिखाई देता है।

ग़ाज़ा में जिस तरह से व्यापक स्तर पर हिंसा और जनहानि हुई है, उसने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गंभीर चिंताएँ पैदा की हैं। इन घटनाओं के बाद नेतन्याहू की छवि उनके विरोधियों की नज़र में एक ऐसे कठोर और निर्दयी नेता के रूप में उभरी है, जो लगातार सैन्य कार्रवाई को ही समाधान मानते हैं। आलोचक तो यहाँ तक कहते हैं कि उनका व्यक्तित्व अब उस दरिंदे की तरह प्रतीत होता है जो बिना ख़ून पिए नहीं रह सकता

इसके साथ ही एक और गंभीर विरोधाभास सामने आता है। एक तरफ अमेरिका दुनिया के सामने सीज़फायर और शांति की बात करता है, वहीं दूसरी तरफ इज़रायल द्वारा लेबनान पर किए गए इन हमलों को अप्रत्यक्ष रूप से जायज़ ठहराने की कोशिश करता दिखाई देता है। यह दोहरी नीति न केवल वैश्विक विश्वास को कमजोर करती है, बल्कि यह संदेश भी देती है कि शक्तिशाली देशों के लिए अलग नियम हैं और कमजोरों के लिए अलग।

डोनाल्ड ट्रंप का रवैया भी इस पूरे परिदृश्य में सवालों के घेरे में है। वे ऐसे राष्ट्रपति के रूप में उभरे हैं जिनके बयानों पर केवल विरोधी देश ही नहीं, बल्कि खुद अमेरिका के भीतर भी संदेह किया जाता रहा है। बार-बार के आरोपों और विवादास्पद बयानों ने उनकी विश्वसनीयता को गहरी चोट पहुँचाई है। उनके वक्तव्यों में स्पष्टता और स्थिरता की कमी अक्सर अंतरराष्ट्रीय मामलों को और उलझा देती है, जिससे शांति की कोशिशों को नुकसान पहुँचता है।

दुर्भाग्य की बात यह भी है कि ऐसे मामलों में अक्सर वैश्विक समुदाय की प्रतिक्रिया सीमित और औपचारिक रह जाती है। अगर वास्तव में शांति और मानवाधिकारों की रक्षा करनी है, तो केवल बयान देना पर्याप्त नहीं होगा। इज़रायल के इस कदम की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और उसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए।

अंततः, लेबनान में कल जो हुआ, वह केवल एक देश पर हमला नहीं था, बल्कि मानवता के मूल सिद्धांतों पर भी आघात था। सीज़फायर का उल्लंघन कर निर्दोष लोगों की जान लेना एक गंभीर अपराध है, जिसे किसी भी सूरत में नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अगर इस तरह की घटनाओं पर सख्त कार्रवाई नहीं हुई, तो मिडिल ईस्ट में शांति केवल एक अधूरा सपना बनकर रह जाएगी।

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