अपनी शहादत से पहले अली लारिजानी ने अरब देशों को बेनक़ाब कर दिया
मध्य-पूर्व की सियासत एक बार फिर उबाल पर है, और इस उथल-पुथल के बीच अली लारिजानी का नाम एक प्रतीक बनकर उभरा है—सच बोलने का, विरोध करने का और आख़िरी सांस तक अपने सिद्धांतों पर डटे रहने का। अपनी शहादत से पहले लारिजानी ने जो संदेश दिया, उसने न सिर्फ़ अमेरिका और इज़रायल की नीतियों को कठघरे में खड़ा किया, बल्कि अरब देशों और मुस्लिम हुक्मरानों की भूमिका को भी बेनक़ाब कर दिया।
लारिजानी ने अपने अंतिम विचारों में सबसे पहले जिस मुद्दे को उठाया, वह था मुस्लिम दुनिया की चुप्पी। जब एक संप्रभु देश पर लगातार हमले हो रहे थे, तब इस्लामी दुनिया के कई बड़े देश या तो खामोश रहे या उन्होंने कूटनीतिक चुप्पी के जरिए हमलावरों को अप्रत्यक्ष समर्थन दिया। यह चुप्पी सिर्फ़ एक राजनीतिक रणनीति नहीं थी, बल्कि एक गहरी कमजोरी और विफलता का प्रतीक थी।
उन्होंने तीखे शब्दों में कहा कि कुछ अरब सरकारें अपने तात्कालिक फायदे के लिए अमेरिका और इज़रायल के साथ खड़ी हो गई हैं। यह रवैया न केवल इस्लामी एकता के सिद्धांत के खिलाफ है, बल्कि यह उन मूल्यों का भी अपमान है, जिनके नाम पर ये देश अपनी पहचान बनाते हैं। लारिजानी के अनुसार, यह “खामोशी” असल में एक तरह की साझेदारी है—एक ऐसी साझेदारी, जो अन्याय को बढ़ावा देती है।
अमेरिका की भूमिका पर बोलते हुए लारिजानी ने उसे एक ऐसी ताकत बताया, जो अपने हितों के लिए पूरी दुनिया को अस्थिर करने से भी नहीं हिचकती। उन्होंने कहा कि अमेरिका लोकतंत्र और मानवाधिकारों की बातें करता है, लेकिन जब उसके अपने रणनीतिक हित सामने आते हैं, तो वही अमेरिका अंतरराष्ट्रीय कानूनों को नजरअंदाज कर देता है। ईरान के खिलाफ की गई कार्रवाइयों को उन्होंने इसी दोहरे मापदंड का उदाहरण बताया।
इज़रायल को लेकर भी उनका रुख बेहद स्पष्ट और कठोर था। उन्होंने कहा कि इज़रायल की नीतियां लंबे समय से आक्रामकता और दमन पर आधारित रही हैं। क्षेत्र में उसकी हर कार्रवाई ने शांति को कमजोर और संघर्ष को मजबूत किया है। ईरान के खिलाफ हमला भी उसी विस्तारवादी सोच का हिस्सा है, जिसमें विरोधियों को खत्म करना ही समाधान माना जाता है।
लेकिन लारिजानी का सबसे महत्वपूर्ण संदेश केवल आलोचना तक सीमित नहीं था। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि नेताओं की शहादत से किसी राष्ट्र की ताकत कम नहीं होती, बल्कि वह और अधिक मजबूत बनता है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जब भी ईरान ने अपने बड़े नेताओं को खोया है, तब-तब देश ने और अधिक मजबूती और एकजुटता के साथ जवाब दिया है।
उनकी यह बात आज और भी प्रासंगिक हो जाती है। लारिजानी की शहादत के बाद ईरान के भीतर एक नई ऊर्जा और एकता देखने को मिल रही है। जनता और नेतृत्व दोनों इस बात को समझते हैं कि यह लड़ाई केवल एक व्यक्ति या सरकार की नहीं, बल्कि देश की संप्रभुता और सम्मान की है।
लारिजानी ने अपने संदेश के माध्यम से मुस्लिम दुनिया को एक कड़ा चेतावनी भरा संकेत भी दिया। उन्होंने कहा कि अगर आज भी अरब देश और मुस्लिम हुक्मरान अपनी जिम्मेदारी नहीं समझेंगे, तो आने वाला समय उनके लिए और अधिक कठिन हो सकता है। जो ताकतें आज उनके सहयोगी दिखाई दे रही हैं, वही कल उनके लिए सबसे बड़ा खतरा बन सकती हैं।
यह लेखा-जोखा केवल एक राजनीतिक बयान नहीं था, बल्कि एक सच्चाई का आईना था, जिसे लारिजानी ने अपनी शहादत से पहले पूरी दुनिया के सामने रख दिया। उन्होंने दिखा दिया कि असली लड़ाई केवल बाहरी दुश्मनों से नहीं, बल्कि अंदरूनी कमजोरी और बंटवारे से भी है।
अंत में, लारिजानी की शहादत एक संदेश बनकर सामने आती है—कि सच्चाई को दबाया नहीं जा सकता, और अन्याय के खिलाफ उठी आवाज़ कभी बेकार नहीं जाती। उन्होंने जिस साहस के साथ अरब देशों की खामोशी, अमेरिका की नीतियों और इज़रायल की आक्रामकता को उजागर किया, वह इतिहास में दर्ज रहेगा।
आज सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या मुस्लिम दुनिया इस चेतावनी को समझेगी, या फिर वही गलतियां दोहराई जाएंगी?
लेकिन एक बात तय है: ईरान झुकेगा नहीं। हर शहादत के बाद उसके इरादे और मजबूत होंगे, और वह पहले से ज्यादा दृढ़ता के साथ अपने रास्ते पर आगे बढ़ेगा।
अली लारीजानी का मुसलमानों और इस्लामी देशों के नाम 6 बिंदुओं वाला पत्र
बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम
दुनिया के मुसलमानों और इस्लामी देशों की सरकारों के नाम
1. ईरान ऐसे समय में अमेरिका-इज़रायल की एक छलपूर्ण आक्रामक कार्रवाई का सामना कर रहा था, जब बातचीत चल रही थी। इस हमले का उद्देश्य ईरान को विभाजित करना था। इस दौरान इस्लामी क्रांति के महान और समर्पित नेता आयतुल्लाह सैयद अली ख़ामेनेई, कई आम नागरिक और सैन्य कमांडर शहीद हो गए। लेकिन इसके जवाब में ईरानी जनता ने राष्ट्रीय और इस्लामी प्रतिरोध का रास्ता अपनाया।
2. आप जानते हैं कि कुछ दुर्लभ राजनीतिक बयानों को छोड़कर लगभग किसी भी इस्लामी देश की सरकार, ईरानी जनता की मदद के लिए आगे नहीं आई। इसके बावजूद ईरान की जनता ने अपने मजबूत संकल्प से दुश्मन को परास्त किया, इस तरह कि आज दुश्मन खुद नहीं समझ पा रहा कि इस रणनीतिक संकट से कैसे निकले।
3. ईरान, अमेरिका और इज़रायल (बड़े और छोटे शैतान) के खिलाफ प्रतिरोध के रास्ते पर आगे बढ़ता रहेगा। लेकिन क्या इस्लामी देशों का रवैया पैगंबर मुहम्मद (सल्ल.) के उस कथन के विपरीत नहीं है जिसमें उन्होंने कहा था: “यदि कोई मुसलमान दूसरे मुसलमान की पुकार का जवाब न दे, तो वह मुसलमान नहीं है।” आखिर यह कैसी मुस्लिम एकता है?
4. कुछ देशों ने तो इससे भी आगे बढ़कर कहा कि, क्योंकि ईरान ने उनके देशों में मौजूद अमेरिकी ठिकानों और अमेरिका-इज़रायल के हितों को निशाना बनाया है, इसलिए ईरान उनका दुश्मन है। क्या ईरान हाथ पर हाथ रखकर बैठा रहता, जबकि उन्हीं देशों में मौजूद अमेरिकी ठिकानों से ईरान पर हमले किए जा रहे थे?
यह केवल बहानेबाजी है। आज इस संघर्ष के एक तरफ अमेरिका और इज़रायल हैं और दूसरी तरफ मुस्लिम ईरान और प्रतिरोध की ताकतें। आप किस पक्ष में खड़े हैं?
5. इस्लामी दुनिया के भविष्य के बारे में सोचिए। आप जानते हैं कि अमेरिका आपसे कभी वफादारी नहीं निभाएगा और इज़रायल आपका दुश्मन है। एक पल रुककर अपने और क्षेत्र के भविष्य के बारे में विचार कीजिए। ईरान आपका शुभचिंतक है और आप पर प्रभुत्व जमाने की कोई इच्छा नहीं रखता।
6. इस्लामी उम्मत की एकता ही वह शक्ति है जो सभी देशों की सुरक्षा, प्रगति और स्वतंत्रता की गारंटी दे सकती है।
बंदा-ए-खुदा
अली लारीजानी


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