कर्नाटक में कोई ग्रुप नहीं, सिर्फ एक ग्रुप है- कांग्रेस ग्रुप: डीके शिवकुमार

कर्नाटक में कोई ग्रुप नहीं, सिर्फ एक ग्रुप है- कांग्रेस ग्रुप: डीके शिवकुमार

कर्नाटक में नेतृत्व परिवर्तन की चर्चा ने राज्य कांग्रेस को फिर से हलचल में डाल दिया है। पार्टी के भीतर शक्ति संतुलन को लेकर चल रहा खींचतान इस हद तक बढ़ गया है कि मामला अब सीधे दिल्ली दरबार तक पहुंच चुका है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने पहली बार स्पष्ट संकेत दिया है कि वे इस विवाद पर सोनिया गांधी और राहुल गांधी से बात करेंगे, जिसके बाद ही किसी प्रकार का अंतिम फैसला सामने आएगा। उनका कहना है कि नेतृत्व से बातचीत के बाद स्थिति साफ की जाएगी और उसी आधार पर अगले कदम तय होंगे।

यह विवाद तब और गर्म हो गया जब कांग्रेस सरकार ने हाल ही में अपने 5 साल के कार्यकाल का आधा सफर पूरा किया। इसी बीच फिर से पुराना दावा उठने लगा कि 2023 में मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और डिप्टी सीएम डीके शिवकुमार के बीच किसी तरह का “सत्ता साझेदारी” समझौता हुआ था। शक की सुई बार-बार इसी ओर घूम रही है, हालांकि पार्टी सार्वजनिक रूप से इसे स्वीकार नहीं करती।

दूसरी ओर, डीके शिवकुमार एक अलग ही सुर में दिखाई दिए। उन्होंने कहा कि कांग्रेस में कोई भ्रम नहीं है और न ही कोई अलग-थलग खड़ा गुट है। उनके मुताबिक पूरा दल 140 विधायकों का एक ही ग्रुप है और किसी को भी पद या सत्ता की मांग करने जैसा व्यवहार नहीं करना चाहिए। यह बयान भले ही एकता का संदेश देता हो, लेकिन इसे पार्टी के भीतर उठ रही बेचैनी को ढकने की कोशिश भी माना जा रहा है। उधर सिद्धारमैया पहले ही साफ कर चुके हैं कि वे पांचों साल मुख्यमंत्री रहेंगे और आगे भी बजट पेश करते रहेंगे।

इस बीच दिल्ली के चक्कर लगा रहे कांग्रेस विधायकों ने भी अंदरखाने गर्मी बढ़ाई है। बेंगलुरु लौटे कुछ विधायकों का कहना है कि वे मुख्यमंत्री को लेकर चल रही अनिश्चितता को दूर करने की मांग कर चुके हैं, जबकि कुछ विधायक मंत्रिमंडल में फेरबदल के दौरान युवाओं और नए चेहरों को जगह देने की बात कर रहे हैं। पार्टी के भीतर यह बातचीत खुलकर भले न दिख रही हो, लेकिन दबाव दोनों तरफ से बन रहा है।

इसी दौरान यह भी सामने आया कि शिवकुमार के समर्थन में कुछ विधायक विशेष तौर पर दिल्ली पहुंचे, ताकि आलाकमान के सामने अपनी बात रख सकें। पिछले सप्ताह भी लगभग 10 विधायकों ने मल्लिकार्जुन खरगे से मुलाकात की थी। शिवकुमार खुद कह चुके हैं कि यह पूरा मुद्दा कुछ चुनिंदा नेताओं के बीच की बातचीत का हिस्सा है, जिसे वे सार्वजनिक रूप से नहीं उछालना चाहते। कुल मिलाकर कर्नाटक कांग्रेस अपने कार्यकाल के बीचों-बीच एक नाज़ुक मोड़ पर खड़ी है। सत्ता के समीकरण किस ओर झुकेंगे, इसका फैसला अब पार्टी हाईकमान के हाथ में है।

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