मदरसा संगठनों और यूपी सरकार के बीच खाई में इजाफा

मदरसा संगठनों और यूपी सरकार के बीच खाई में इजाफा

जहां एक तरफ उत्तर प्रदेश के अनुदानित और मान्यता प्राप्त मदरसों का मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है, वहीं दूसरी तरफ यूपी सरकार के मुख्य सचिव के नए आदेश ने मदरसों से जुड़े लोगों की चिंता और बेचैनी में और वृद्धि कर दी है। टीचर्स एसोसिएशन मदरसा अरबिया ने मुख्य सचिव के ताजा आदेश पर नाराजगी जताते हुए चेतावनी दी है कि यदि यह आदेश वापस नहीं लिया गया तो अदालत की अवमानना का मुकदमा दायर किया जाएगा। गौरतलब है कि 26 जून 2024 को राज्य के मुख्य सचिव द्वारा सभी जिला मजिस्ट्रेट को आदेश जारी करके कहा गया है कि यूपी के गैर-मान्यता प्राप्त मदरसों के छात्रों को औपचारिक शिक्षा के लिए अन्य सरकारी स्कूलों में दाखिल कराने की प्रक्रिया की मासिक रिपोर्ट पेश की जाए। साथ ही अनुदानित, मान्यता प्राप्त और गैर-मान्यता प्राप्त मदरसों में पढ़ने वाले सभी गैर-मुस्लिम छात्रों को भी अन्य सरकारी स्कूलों में दाखिल कराने की प्रगति रिपोर्ट पेश की जाए। मुख्य सचिव के इस आदेश के बारे में यूपी सरकार का कहना है कि यह मामला अलग है जिसे सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन मामले के साथ जोड़कर देखना गलतफहमी होगी।

यूपी के मुख्य सचिव द्वारा 26 जून 2024 को जारी आदेश से मदरसों से जुड़े संगठनों में गुस्सा और बेचैनी है। मुख्य सचिव के आदेश में राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) के 7 जून 2024 के पत्र का हवाला दिया गया है जिसमें कहा गया है कि यूपी के सभी अनुदानित और मान्यता प्राप्त मदरसों में पढ़ने वाले गैर-मुस्लिम बच्चों की पहचान करके उन्हें अन्य सरकारी स्कूलों में दाखिल कराया जाए और राज्य के सभी बिना मैपिंग वाले मदरसों की मैपिंग कराकर उनमें पढ़ने वाले छात्रों को पारंपरिक शिक्षा के सरकारी स्कूलों में दाखिल कराया जाए।

एनसीपीसीआर की उक्त हिदायत की रोशनी में यूपी के मुख्य सचिव ने उत्तर प्रदेश के 4204 गैर-मान्यता प्राप्त मदरसों की सूची संलग्न करते हुए अपने आदेश में कहा कि इन गैर-मान्यता प्राप्त मदरसों में पढ़ने वाले सभी छात्रों को औपचारिक शिक्षा प्रदान करने के लिए ‘बेसिक शिक्षा परिषद’ के तहत आने वाले स्कूलों में दाखिला दिया जाए। इसके लिए जिला मजिस्ट्रेट के माध्यम से जिला स्तर पर समितियां बनाई जाएं जिनमें डिप्टी डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट, जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी और जिला अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारी शामिल होंगे और स्थानीय पुलिस अधिकारी (सीओ) इस समिति के साथ सहयोग करेंगे। इसके साथ ही यह भी निर्देश दिया गया है कि यदि किसी जिले में संलग्न सूची में उल्लिखित मदरसों के अलावा भी कोई गैर-मान्यता प्राप्त मदरसा पाया जाता है तो उसकी जानकारी भी उपलब्ध कराई जाए।

मुख्य सचिव ने सभी जिला मजिस्ट्रेट को उक्त दोनों बिंदुओं पर मासिक प्रगति की जानकारी यूपी के अल्पसंख्यक कल्याण विभाग के निदेशक को उपलब्ध कराने का निर्देश दिया है, साथ ही यह भी कहा है कि अल्पसंख्यक कल्याण विभाग द्वारा सभी जिलों से प्राप्त होने वाली प्रगति रिपोर्ट को संकलित करके मुख्य सचिव के कार्यालय को उपलब्ध कराया जाए। टीचर्स एसोसिएशन मदरसा अरबिया यूपी ने अनुदानित और मान्यता प्राप्त मदरसों से गैर-मुस्लिम बच्चों और गैर-मान्यता प्राप्त मदरसों से सभी बच्चों को अन्य स्कूलों में स्थानांतरित करने के आदेश को सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया के 5 अप्रैल 2024 के ‘स्टे’ के संदर्भ में अदालत की अवमानना मानते हुए इसे वापस लेने की मांग की है।

एनसीपीसीआर के चेयरमैन, यूपी के मुख्य सचिव और अल्पसंख्यक कल्याण विभाग की अतिरिक्त मुख्य सचिव और निदेशक को भेजे गए मेमोरेंडम में एसोसिएशन के महासचिव दीवान साहब जमां खां ने कहा कि इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने 22 मार्च 2024 के अपने फैसले में अनुदानित और मान्यता प्राप्त मदरसों से बच्चों को स्कूलों में शिफ्ट करने का आदेश दिया था जिसके अनुपालन में मुख्य सचिव यूपी ने 4 अप्रैल 2024 के अपने आदेश में छात्रों की शिफ्टिंग के लिए जिला मजिस्ट्रेट की अध्यक्षता में समिति बनाई थी।

हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ टीचर्स एसोसिएशन मदरसा अरबिया यूपी और अन्य संगठनों ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की थी जिसकी सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ की तीन सदस्यीय बेंच ने 5 अप्रैल 2024 को हाई कोर्ट के फैसले को ‘स्टे’ कर दिया था जिसके बाद मुख्य सचिव ने अपना 4 अप्रैल का आदेश, सुप्रीम कोर्ट के अंतिम फैसले तक रद्द कर दिया था। दीवान जमां खां का कहना है कि अब जबकि सुप्रीम कोर्ट में जल्द ही अंतिम सुनवाई होने वाली है, छात्रों की शिफ्टिंग का दोबारा आदेश जारी करना सुप्रीम कोर्ट के ‘स्टे आदेश’ का उल्लंघन है। उनका यह भी कहना है कि अगर नया आदेश वापस नहीं लिया जाता है तो ‘अवमानना’ के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की जाएगी।

उपरोक्त सभी पहलुओं पर अल्पसंख्यक कल्याण विभाग की निदेशक जे रिभा ने दैनिक ‘इंकलाब’ से बातचीत करते हुए यह स्पष्ट किया कि ‘नेशनल कमीशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ चाइल्ड राइट्स’ के निर्देश का पालन करते हुए 26 जून 2024 को मुख्य सचिव का आदेश जारी किया गया है और यह कार्रवाई गैर-मान्यता प्राप्त मदरसों के बच्चों और गैर-मुस्लिम बच्चों को विभागीय शिक्षा के स्कूलों में दाखिल कराने से संबंधित है जिसका संबंध सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन मामले से नहीं है।

अल्पसंख्यक कल्याण विभाग से जुड़े सूत्रों का कहना है कि मुख्य सचिव का नया आदेश, मान्यता प्राप्त या अनुदानित मदरसों को बंद करने या मदरसा अधिनियम 2004 को निरस्त करने या इसे अवैध घोषित करने से संबंधित बिल्कुल नहीं है बल्कि गैर-मान्यता प्राप्त मदरसों में पढ़ने वाले बच्चों और गैर-मुस्लिम बच्चों से संबंधित है। उनका कहना है कि सरकार के किसी भी कार्यक्रम/योजना के सही संचालन के लिए समय-समय पर आदेश जारी किए जाते हैं जो सरकारी प्रक्रिया का एक हिस्सा होता है और मुख्य सचिव का नया आदेश भी उसी का एक हिस्सा है, जिसका सीधे तौर पर सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन मामले से कोई संबंध नहीं है और सरकार ने स्वयं भी अपने जवाबी हलफनामे में स्पष्ट किया है कि वह सुप्रीम कोर्ट के अंतिम निर्णय का पालन करेगी।

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