ट्रंप के अलावा किसी भी राष्ट्रपति ने ईरान पर हमले की नेतन्याहू की योजना को स्वीकार नहीं किया: जॉन केरी
अमेरिका के पूर्व विदेश मंत्री जॉन केरी ने एक महत्वपूर्ण खुलासा करते हुए कहा कि, इज़रायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू लंबे समय से ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर सैन्य कार्रवाई के पक्षधर रहे हैं। केरी के अनुसार, बराक ओबामा के राष्ट्रपति कार्यकाल के दौरान नेतन्याहू ने कई बार ईरान पर सीधे हमले की योजनाएँ अमेरिका के सामने रखीं।
केरी ने बताया कि, ओबामा प्रशासन ने इन प्रस्तावों का गंभीरता से मूल्यांकन किया, लेकिन अंततः उन्हें खारिज कर दिया। उनका मानना था कि ईरान पर हमला करने से पूरे मध्य पूर्व में बड़े पैमाने पर युद्ध छिड़ सकता है, जिससे क्षेत्रीय और वैश्विक स्थिरता को गंभीर खतरा पैदा होगा। इसी कारण ओबामा ने कूटनीतिक रास्ता अपनाते हुए ईरान के साथ परमाणु समझौते (JCPOA) को प्राथमिकता दी।
जॉन केरी ने यह भी कहा कि केवल ओबामा ही नहीं, बल्कि अन्य अमेरिकी राष्ट्रपति—जैसे जॉर्ज डब्ल्यू. बुश और वर्तमान राष्ट्रपति जो बाइडेन—ने भी ईरान पर सीधे सैन्य हमले के विकल्प को बेहद जोखिमपूर्ण मानते हुए उससे दूरी बनाए रखी। इन नेताओं का मानना था कि ऐसा कदम अमेरिका को एक लंबे और महंगे युद्ध में धकेल सकता है।
केरी के मुताबिक, डोनाल्ड ट्रंप इस मामले में अपवाद रहे। उन्होंने न केवल ईरान के साथ हुए परमाणु समझौते से अमेरिका को बाहर निकाला, बल्कि नेतन्याहू की सख्त नीति और दबाव की रणनीति के अधिक करीब दिखाई दिए। केरी का दावा है कि ट्रंप ऐसे पहले राष्ट्रपति थे जिन्होंने ईरान पर हमले की योजना को स्वीकार करने की इच्छा दिखाई।
इस बयान के बाद राजनीतिक और सामरिक हलकों में बहस तेज हो गई है। कई विश्लेषकों का मानना है कि ईरान जैसे बड़े और प्रभावशाली देश के खिलाफ सैन्य कार्रवाई से न केवल मध्य पूर्व, बल्कि पूरी दुनिया में अस्थिरता बढ़ सकती है। यही कारण है कि अधिकांश अमेरिकी राष्ट्रपतियों ने अब तक संयम और कूटनीति को प्राथमिकता दी है।
विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि ईरान के पास मजबूत सैन्य क्षमता और क्षेत्रीय सहयोगियों का नेटवर्क है, जिससे किसी भी युद्ध की स्थिति में संघर्ष व्यापक और जटिल हो सकता है। इसलिए अमेरिका की पिछली सरकारों ने सीधे टकराव से बचने की नीति अपनाई, जबकि दबाव और प्रतिबंधों के जरिए अपने उद्देश्य हासिल करने की कोशिश की।


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