तेहरान में आयतुल्लाह ख़ामेनेई के जनाज़े में उमड़ी भीड़, ट्रंप और नेतन्याहू के लिए एक सबक़ है
ईरान की राजधानी तेहरान का मुसल्ला मैदान आज पूरी दुनिया में चर्चा का विषय बन गया है। वैसे तो मुसल्ला मैदान पर ईरान के शहीद सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह ख़ामेनेई ने कई बार नमाज़े जुमा पढ़ाई है, और हज़ारों की संख्या में लोग शरीक होते रहे हैं, लेकिन कल उनकी नमाज़े जनाज़े में उमड़ी भीड़ हज़ारों या लाखों की संख्या में नहीं थी बल्कि करोड़ों की संख्या में थी।
दुनिया ने आज तक किसी लीडर या किसी धार्मिक नेता का ऐसा जनाज़ा नहीं देखा जिसमें इतनी संख्या में लोग जमा हुए हों। ऐसा लग रहा था मानो पूरा ईरान तेहरान में समा गया है। ईरान में इस समय अरबईन का मंज़र नज़र आ रहा है। एक वक़्त में एक जगह पर इतनी भीड़ का जमा होना किसी चमत्कार से कम नहीं।
यह तो सिर्फ़ तेहरान में जमा हुई भीड़ की बात है। इराक़ में तो इससे ज़्यादा की संख्या में भीड़ जमा होने की संभावना है। तेहरान में जमा हुई भीड़ ने पूरी दुनिया को यह मैसेज दे दिया कि, आयतुल्लाह ख़ामेनेई ईरानी जनता के जिस्मों पर नहीं दिलों पर हुकूमत करते थे। लोगों के जिस्मों पर हुकूमत करने वालों का नामो निशान मिट जाता है, लेकिन जो दिलों पर हुकूमत करता है, वह हमेशा ज़िंदा रहता है। ईरान की जनता ने अपने प्रिय लीडर आयतुल्लाह ख़ामेनेई के जनाज़े में औरतों बच्चों और बूढ़ों के साथ जमा होकर ईरान में तानाशाही का प्रोपेगंडा फैलाने वालों के मुंह पर ज़ोरदार तमाचा मारा है।
आयतुल्लाह ख़ामेनेई के अंतिम संस्कार में उमड़े जनसैलाब ने ट्रंप और नेतन्याहू को कुछ बोलने के क़ाबिल नहीं छोड़ा। सुप्रीम लीडर” को शहीद करने के बाद बहुत ही ग़ुरुर के साथ ट्रंप का यह यह बयान कि, अब ईरान की सरकार अमेरिका से चलेगी” एक मज़ाक़ बन गया है। ख़ुद ट्रंप ने यह स्वीकार किया है कि, आयतुल्लाह ख़ामेनेई के जनाज़े में इतनी संख्या में औरतों, बच्चों और बूढ़ों को रोते देखकर दंग रह गया हूं।
ट्रंप को उनकी हैसियत का एहसास आयतुल्लाह ख़ामेनेई ने उनके पहले कार्यकाल में ही करा दिया था जब जापान के स्वर्गीय प्रधानमंत्री शिंजो आबे उनका संदेश लेकर शहीद सुप्रीम लीडर के पास पहुंचे थे। उस शहीद सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह ख़ामेनेई ने शिंजो आबे से कहा था कि, हमें आपकी नेक नीयती पर कोई शक नहीं लेकिन हम ट्रंप को बात करने के लायक़ ही नहीं समझते। आयतुल्लाह ख़ामेनेई ने उस वक़्त पूरी दुनिया को और विशेष रूप से अरब शासकों को यह संदेश दिया था कि, जिस अमेरिका इस्राईल और ट्रंप के सामने तुमने अपनी मान-मर्यादा और धन दौलत को गिरवी रख दिया है, उसकी हमारे सामने यह औक़ात है कि, हम उसे बात करने के लायक़ भी नहीं समझते।
शहीद होने के बाद भी दुश्मन को कैसे दफ़्न किया जाता है यह अली ख़ामेनेई ने पूरी दुनिया को सिखा दिया है। यह सब कुछ उन्होंने रसूल के नवासे हज़रत इमाम हुसैन से सीखा था। उनके सामने हर वक़्त इमाम हुसैन का यह जुमला था कि, ज़िल्लत की ज़िंदगी से इज़्ज़त की मौत बेहतर है।


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