मीनाब की मासूम छात्राओं का ख़ून, अमेरिका के माथे पर कलंक का टीका है

मीनाब की मासूम छात्राओं का ख़ून, अमेरिका के माथे पर कलंक का टीका है

मीनाब में मासूम छात्राओं की मौत की ख़बर ने हर संवेदनशील इंसान को झकझोर कर रख दिया है। यदि किसी सैन्य कार्रवाई में निर्दोष बच्चे और आम नागरिक अपनी जान गंवाते हैं, तो यह केवल एक देश का नहीं, बल्कि पूरी मानवता का दर्द बन जाता है।

ऐसी हर घटना पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय, संयुक्त राष्ट्र और मानवाधिकार संगठनों का दायित्व है कि वे निष्पक्ष और पारदर्शी जांच की मांग करें तथा यदि अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून का उल्लंघन हुआ है, तो जिम्मेदार लोगों की जवाबदेही सुनिश्चित की जाए। किसी भी देश या शक्ति के लिए यह स्वीकार्य नहीं होना चाहिए कि सैन्य संघर्षों की कीमत मासूम नागरिक और बच्चे चुकाएँ।

मासूम बच्चों का ख़ून किसी राजनीतिक या सैन्य लक्ष्य से अधिक मूल्यवान है। इतिहास गवाह है कि युद्ध समाप्त हो जाते हैं, लेकिन निर्दोष बच्चों की मौत का दर्द और उनके परिवारों का दुःख पीढ़ियों तक बना रहता है। इसलिए हर ऐसी घटना की निष्पक्ष जांच, पीड़ितों के लिए न्याय और भविष्य में ऐसी त्रासदियों को रोकने के लिए ठोस कदम उठाना पूरी दुनिया की साझा जिम्मेदारी है।

मीनाब का घाव फिर हुआ ताज़ा

ईरान के मीनाब के शजर-ए-तैय्यिबा प्राथमिक विद्यालय के मलबे की दोबारा खोजबीन के दौरान 34 शहीद छात्राओं से संबंधित 68 पार्थिव अवशेष बरामद किए गए। ये वे शहीद थे जिन्हें पहले ही दफ़ना दिया गया था, लेकिन अब डीएनए परीक्षण के बाद मिले इन अतिरिक्त अवशेषों की पहचान होने पर उन्हें पूरे सम्मान के साथ पुनः अंतिम विदाई और दफ़न की रस्म अदा की गई।

यह घटना मीनाब के लोगों के लिए एक बार फिर गहरे दुख और शोक का कारण बन गई।मीनाब के स्कूल में शहीद हुए लोगों के पार्थिव अवशेषों की पहचान डीएनए परीक्षण के माध्यम से की गई है। इसी आधार पर उनके अवशेषों का अंतिम संस्कार और अंतिम विदाई समारोह आयोजित किया गया।

अंतिम संस्कार से पहले तैयार किए गए नए बरामद अवशेष

हाल ही में मलबे से बरामद किए गए पार्थिव अवशेषों की डीएनए जांच कर उनकी पहचान और अलग-अलग वर्गीकरण किया गया। इन पवित्र अवशेषों का अंतिम संस्कार और दफ़न आज सुबह 7:30 बजे मीनाब में संपन्न हुआ।

मीनाब की शहीद छात्राओं के माता-पिता ने दी अंतिम विदाई

मीनाब के शहीदों के माता-पिता ने अपने बच्चों के बचे हुए पार्थिव अवशेषों को अत्यंत भावुक वातावरण में अंतिम विदाई दी। यह दृश्य पूरे क्षेत्र को शोक में डुबो देने वाला था।

28 फ़रवरी को अमेरिका ने ईरान पर धोखे से कायराना हमला करके केवल वहां के सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह ख़ामेनेई को ही शहीद नहीं किया था, वहां स्कूल में पढ़ रही 168 मासूम छात्राओं को भी शहीद कर दिया था। आयतुल्लाह ख़ामेनेई और मासूम छात्राओं की शहादत से अमेरिका के माथे पर जो कलंक का टीका लगा है उसे कभी मिटाया नहीं जा सकता।

आज मीनाब स्कूल के खंडहर और और छात्राओं के बिखरे हुए अवशेष चीख़ चीख़ कर अमेरिका से मानवता की दुहाई देने वाले तथाकथित मानवाधिकार संगठनों से पूछ रहे है कि, आज तुम्हारी इंसानियत कहां मर गई है??

आज तुम अमेरिका के ख़िलाफ़ खुलकर क्यों नहीं बोलते??

क्या तुम्हारी निगाहों में मासूम छात्राओं के ख़ून का कोई महत्व नहीं है??

क्या किसी में इतनी हिम्मत नहीं बची है कि, वह अमेरिका को उसके युद्ध अपराधों के कारण कटघरे में खड़ा कर सके??

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