सीरिया में लोकतंत्र की वकालत करने वाले अरब देश, खुद चुनाव क्यों नहीं कराते ??

सीरिया में लोकतंत्र की वकालत करने वाले अरब देश, खुद चुनाव क्यों नहीं कराते ??

अल-जूलानी को आतंकी घोषित करने वाले वही पश्चिमी और अरब देश अब उसे नया नेतृत्व देने की कोशिश कर रहे हैं। यह खेल न केवल सीरिया में अस्थिरता को बढ़ाएगा, बल्कि यह भी दिखाएगा कि आतंकवाद की परिभाषा पश्चिम और अरब सरकारों के लिए केवल एक राजनीतिक औजार है, जिसका इस्तेमाल वे अपने हितों के अनुसार करते हैं। अल-कायदा से जुड़े रहे अबू मोहम्मद अल-जूलानी को कभी दुनिया का एक खतरनाक आतंकवादी माना गया था, लेकिन आज वही पश्चिमी देश और अरब सरकारें, जो कभी उनके खिलाफ कार्रवाई की मांग कर रही थीं, अब उनके साथ समझौते की राह खोज रही हैं। यह स्थिति न केवल इन देशों की दोहरी नीति को उजागर करती है, बल्कि यह भी दिखाती है कि किस तरह पश्चिम और उसके सहयोगी अपने राजनीतिक और सामरिक हितों के लिए आतंकवाद की परिभाषा बदलते रहते हैं।

सीरियाई मीडिया ने आज, रविवार को रिपोर्ट दी कि अहमद अल-शराअ, जो अबू मोहम्मद अल-जूलानी के नाम से मशहूर हैं, ने सीरिया की अंतरिम सरकार के प्रमुख के रूप में अपने पहले आधिकारिक दौरे पर विदेश मंत्री ‘असअद अल-शैबानी’ के साथ सऊदी अरब की यात्रा की। इससे पहले, अरब मीडिया ने बताया था कि अबू मोहम्मद अल-जूलानी अपने पहले आधिकारिक दौरे के तहत रियाद की यात्रा करेंगे। बीते गुरुवार को सऊदी किंग ‘सलमान बिन अब्दुलअज़ीज़’ और उनके क्राउन प्रिंस ‘मोहम्मद बिन सलमान’ ने अल-जूलानी को सीरिया की अंतरिम सरकार के प्रमुख का पदभार संभालने पर बधाई दी थी।

दूसरी ओर, सीरिया के नए विदेश मंत्री ‘असअद अल-शैबानी’ का भी इस साल जनवरी की शुरुआत में पहला आधिकारिक दौरा सऊदी अरब में हुआ था। इससे पहले, 24 जनवरी को, सऊदी विदेश मंत्री ‘फैसल बिन फरहान’ एक उच्च स्तरीय प्रतिनिधिमंडल के साथ दमिश्क पहुंचे थे, जहां उन्होंने ‘अल-शराअ’ और ‘असअद अल-शैबानी’ से मुलाकात की थी। इससे पहले, अल-शराअ ने तुर्की मीडिया से बातचीत में कहा था कि उनका पहला विदेशी दौरा तुर्की या सऊदी अरब में होगा। विश्लेषकों के अनुसार, अल-जूलानी के लिए सीरिया के सऊदी अरब, तुर्की और कतर के साथ संबंधों को मजबूत करना बहुत महत्वपूर्ण है। उन्होंने सीरिया के पुनर्निर्माण के लिए रियाद से राजनीतिक और आर्थिक समर्थन की उम्मीद जताई है।

सीरिया में लोकतंत्र की वकालत करने वाले अरब देश खुद चुनाव से बचते हैं क्योंकि उनकी सत्ता लोकतांत्रिक व्यवस्था के अनुकूल नहीं है। असद सरकार के पतन के बाद वे अपने हितों की रक्षा के लिए जूलानी या अन्य विरोधी गुटों का समर्थन कर सकते हैं, लेकिन अपने देशों में लोकतंत्र लागू करने को तैयार नहीं हैं। अरब देशों द्वारा सीरिया में लोकतंत्र की मांग करना एक बड़ा विरोधाभास प्रस्तुत करता है। ये देश दावा करते हैं कि बशर अल-असद का शासन अधिनायकवादी था और वहां लोगों को राजनीतिक स्वतंत्रता नहीं मिलती थी। लेकिन खुद इन देशों में राजनीतिक दलों की स्वतंत्रता नहीं है, आम जनता को सत्ता परिवर्तन में कोई भूमिका नहीं दी जाती, और असहमति को दबाने के लिए कठोर दमनचक्र चलाए जाते हैं।

अरब देशों की नीति स्पष्ट रूप से दोहरे मानदंडों पर आधारित है। वे लोकतंत्र की बात तो करते हैं, लेकिन अपने शासन को राजशाही या अधिनायकवाद से मुक्त नहीं करना चाहते। असल में, सीरिया में लोकतंत्र की वकालत उनके लिए एक राजनीतिक उपकरण है, जिसका उपयोग वे असद सरकार को कमजोर करने और क्षेत्रीय शक्ति संतुलन में अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए करते हैं।

अरब देशों द्वारा सीरिया में लोकतंत्र की मांग करना खुद उनके गैर-लोकतांत्रिक शासन के संदर्भ में एक विडंबना है। लोकतंत्र की वकालत करने वाले इन देशों को पहले अपने भीतर लोकतांत्रिक सुधार करने चाहिए, लेकिन वे ऐसा करने से बचते हैं क्योंकि इससे उनकी सत्ता को सीधी चुनौती मिल सकती है। इससे साफ जाहिर होता है कि उनके लिए लोकतंत्र एक वास्तविक सिद्धांत नहीं, बल्कि केवल एक भू-राजनीतिक हथियार है। आइये जानते हैं कि, यूरोपीय और अरब देश अल-जूलानी को पहले आतंकवादी मानने के बाद भी अब उसका खुलकर समर्थन क्यों कर रहे हैं??

1. पश्चिमी देशों की दोहरी नीति
अल-जूलानी को पहले अमेरिका और यूरोपीय देशों ने एक वैश्विक आतंकवादी घोषित किया था। सीरिया में अल-नुसरा फ्रंट के नेतृत्व में उन्होंने असद सरकार के खिलाफ जिहाद छेड़ा था। लेकिन जैसे ही हालात बदले और असद सरकार के पतन का पतन हुआ, पश्चिमी देशों ने अल-जूलानी और उसके संगठन को एक “नरम इस्लामवादी गुट” के तौर पर पेश करना शुरू कर दिया। अब अमेरिका और यूरोपीय मीडिया में उसे एक “स्थानीय नेता” के रूप में दिखा रहे हैं, और दुनियां को यह धोखा देने की कोशिश कर रहे हैं कि, वह सीरिया में एक स्थायी सत्ता स्थापित कर सकता है।

2. अरब सरकारों की मौकापरस्ती
अरब देशों, खासकर सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने पहले अल-जूलानी को एक कट्टर आतंकवादी बताया था, लेकिन अब वह अल-जूलानी पर लट्टू हो रहे हैं कि व ह उसे सीरिया में अपने हितों के लिए एक संभावित साझेदार के रूप में देख रहे हैं। इसका मुख्य कारण यह है कि अरब देश अब तुर्की और ईरान के प्रभाव को कम करने के लिए सीरिया में एक ऐसा गुट चाहते हैं, जो उनके नियंत्रण में हो।

3. आतंकवाद की बदलती परिभाषा
पश्चिमी और अरब देश जब तक किसी गुट को अपने हितों के खिलाफ मानते हैं, तब तक वह आतंकवादी रहता है, लेकिन जब वही गुट उनके काम आने लगता है, तो उसे ‘विद्रोही’, ‘स्थानीय नेता’ या ‘सुधरा हुआ इस्लामवादी’ कहा जाने लगता है। पहले यह खेल अफगानिस्तान में तालिबान के साथ खेला गया था, फिर लीबिया और अब सीरिया में अल-जूलानी के साथ वही नीति अपनाई जा रही है।

4. अल-जूलानी को नायक बनाने की कोशिश
अब पश्चिमी मीडिया में अल-जूलानी को एक ऐसे व्यक्ति के रूप में दिखाया जा रहा है, जिसने अपने संगठन को बदल लिया है और अब वह “राजनीतिक समाधान” चाहता है। यह बदलाव अचानक नहीं आया, बल्कि इसके पीछे पश्चिमी एजेंसियों और अरब सरकारों की रणनीति है, जो एक “नया विकल्प” तलाश रही हैं ताकि सीरिया में अपने प्रभाव को बचा सकें।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): ये लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए IscPress उत्तरदायी नहीं है।

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