हिज़्बुल्लाह के हमलों से डरकर 11 हज़ार इज़रायली नागरिकों ने पलायन के लिए आवेदन दिया
किर्यात शमोना की स्थिति अब केवल एक स्थानीय संकट नहीं रह गई है, बल्कि यह नेतन्याहू सरकार की नीतिगत विफलताओं का प्रतीक बनती जा रही है। एक तरफ़ वहाँ के हज़ारों लोग लगातार मिसाइल और ड्रोन हमलों के डर में जी रहे हैं, दूसरी तरफ़ सरकार का यह कहना कि “बजट नहीं है”, लोगों के गुस्से को और बढ़ा रहा है। यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि जो सरकार सैन्य अभियानों पर भारी खर्च कर सकती है, वह अपने ही नागरिकों की सुरक्षा और पुनर्वास के लिए संसाधन क्यों नहीं जुटा पा रही।
‘येदियौत अहारोनोत’ ने लिखा कि लगभग 11 हज़ार लोग, जो किर्यात शमोना में रह रहे हैं और जो हिज़्बुल्लाह के मिसाइल और ड्रोन हमलों की सीधी ज़द में हैं, उन्होंने सुरक्षित इलाकों में स्थानांतरण के लिए आवेदन किया है, ताकि लगातार बजने वाले सायरनों और तंग भूमिगत बंकरों में लंबी ज़िंदगी से छुटकारा पा सकें।
करीब 11 हज़ार लोगों द्वारा सुरक्षित इलाकों में जाने की मांग यह दिखाती है कि ज़मीनी हालात कितने गंभीर हैं। लेकिन आधे से ज़्यादा आवेदनों को ठुकरा देना इस बात का संकेत है कि सरकार ज़मीनी सच्चाई से ज़्यादा अपनी छवि को लेकर चिंतित है। 5 हज़ार से अधिक लोगों को युद्ध जैसे माहौल में रहने के लिए मजबूर करना किसी भी लोकतांत्रिक शासन के लिए गंभीर सवाल खड़े करता है।
दूसरी ओर, हिज़्बुल्लाह की लगातार कार्रवाइयों ने यह साबित कर दिया है कि वह केवल सीमित जवाबी कार्रवाई तक सीमित नहीं है, बल्कि रणनीतिक दबाव बनाने में भी सक्षम है। उत्तरी क्षेत्रों में पैदा हुआ यह दबाव इज़रायल की सुरक्षा व्यवस्था की कमजोरियों को उजागर कर रहा है। यही कारण है कि सरकार नागरिकों के पलायन को भी रोकना चाहती है, ताकि यह स्वीकार न करना पड़े कि प्रतिरोधी ताक़तें (हिज्बुल्लाह) प्रभावी साबित हो रही हैं।
रिपोर्ट के एक अन्य हिस्से में कहा गया है: “नेतन्याहू सरकार किर्यात शमोना के निवासियों के पलायन के लिए फंड देने से इसलिए बच रही है, ताकि हिज़्बुल्लाह के लिए जीत की छवि न बन जाए।”

