इस्राईल द्वारा वर्ष 1915 में ओटोमन साम्राज्य के दौरान हुई घटनाओं को “आर्मेनियाई नरसंहार” के रूप में मान्यता देने की प्रक्रिया शुरू करने की खबर के बाद आज़रबैजान ने कड़ी नाराज़गी जताई है। इस घटनाक्रम से दोनों देशों के बीच राजनयिक तनाव बढ़ गया है
इस्राईली मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, आज़रबैजान ने तल अवीव को स्पष्ट संदेश दिया है कि वह इस संवेदनशील ऐतिहासिक मुद्दे का राजनीतिक इस्तेमाल न करे। बाकू ने चेतावनी दी है कि यदि यह प्रस्ताव आगे बढ़ाया गया तो दोनों देशों के रणनीतिक और राजनीतिक संबंधों पर गंभीर असर पड़ सकता है।
रिपोर्ट के मुताबिक, आज़रबैजान के कड़े विरोध के बाद इस्राईल ने फिलहाल इस प्रस्ताव को आगे बढ़ाने की प्रक्रिया रोक दी है। बताया गया है कि इस्राईल के विदेश मंत्री गिदोन सार ने फैसला सार्वजनिक होने के बाद आज़रबैजान के विदेश मंत्री जयहून बायरामोव से संपर्क किया। इस बात को लेकर भी बाकू ने नाराज़गी जताई कि उसे पहले से इस फैसले की जानकारी नहीं दी गई।
आज़रबैजान ने उम्मीद जताई है कि यह प्रस्ताव इस्राईल की संसद में मतदान के लिए नहीं लाया जाएगा। उसका कहना है कि दोनों देशों के बीच वर्षों से मजबूत रणनीतिक सहयोग रहा है और ऐसे कदम से विश्वास को नुकसान पहुंचेगा।
इस्राईल के कुछ राजनीतिक विश्लेषकों और पूर्व अधिकारियों का भी मानना है कि इस कदम से देश को कोई विशेष रणनीतिक लाभ नहीं मिलेगा। उनका कहना है कि आज़रबैजान जैसे करीबी सहयोगी के साथ रिश्ते खराब करना इस्राईल के हित में नहीं होगा
राजनीतिक विश्लेषक यूरी बुचारोव का कहना है कि इस्राईल में “आर्मेनियाई नरसंहार” का मुद्दा पिछले दो दशकों से समय-समय पर राजनीतिक कारणों से उठता रहा है। उनके अनुसार, इस बार भी यह पहल आगामी संसदीय चुनावों और सत्तारूढ़ दल की अंदरूनी राजनीति से जुड़ी हो सकती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि विदेश मंत्री गिदोन सार पार्टी के भीतर अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए इस मुद्दे को आगे बढ़ा रहे हैं। हालांकि, आज़रबैजान की कड़ी प्रतिक्रिया के बाद फिलहाल यह मामला ठंडे बस्ते में जाता दिखाई दे रहा है।

