अरबईन मार्च, दुनिया के सबसे बड़े मार्च की दिलचस्प दास्तान -2 अरबईन मार्च के अवसर पर इराक पहुँचने वाले किसी भी श्रद्धालु के लिए यह सुविधा होती है कि वह किसी भी मकान में किसी भी वक्त जाकर आराम कर सकता है।
अरबईन मार्च के लिए इराक के दूरस्थ और निकट क्षेत्रों समेत दुनिया के कोने कोने से आये ज़ाएरीन की सेवा का अवसर पाने के लिए लोग एक दूसरे से स्वस्थ पर्तिस्पर्धा करते हुए प्रतीत होते हैं।
स्थानीय लोग इस आयोजन के दौरान धार्मिक स्थल कर्बला या नजफ शहर को खाली कर देते हैं ताकि विदेश से आने वाले श्रद्धालू सुकून के साथ इमाम हुसैन और हज़रत अली के पवित्र रौज़े का दर्शन कर सकें।
स्थानीय नागरिकों के सहयोग के बिना किसी भी सरकार विशेष कर बगदाद सरकार के लिए इतने बड़े आयोजन की कल्पना तक नहीं की जा सकती है। स्वंयसेवी समूह न हों तो सरकार तो सुरक्षा तक की ज़िम्मेदारी उठाने तक में नाकाम रह जाती है। इराक सरकार को हर साल इस आयोजन के लिए ईरान के खूफिया विभाग एवं उसके सैन्य परामर्श एवं सहयोग की ज़रूरत पड़ती है।
इराक में होने वाले अरबईन मार्च के दौरान पूरे देश डॉक्टर्स , टीचर्स, अधिकारी, राजनेता, धर्म गुरु, और यहां तक की सरकार के अहम मंत्री तक कर्बला शहर को जाती हुई सड़कों पर डेरा जमाए बैठ जाते हैं। इराक का हर गणमान्य व्यक्ति श्रद्धालुओं की हर तरह की मदद मुहैया कराने के लिए तत्पर रहता है और इसे अपने लिए सौभाग्य समझते हुए अपने आप को ख़ुशक़िस्मत समझता है।
कोरोना वायरस के कारण पिछले दो सालों से इस आयोजन में महज 1 करोड़ लोगों को ही इंट्री दी जा रही है मगर कोरोना वायरस के प्रकोप से पहले साल 2019 में रिकार्ड 5.50 करोड़ की भीड़ को दर्ज किया गया था।
कुछ दिन पहले भी अरबईन के दिन कर्बला में स्थित हज़रत अब्बास हौली श्राइन की ओर से आधिकारिक बयान जारी करते हुए कहा गया था कि कड़े कोरोना प्रोटोकॉल और सिमित वीज़ा के बाद भी कर्बला में 1 करोड़ 70 लाख से अधिक ज़ाएरीन अरबईन के दिन पहुंचे थे।
सबसे हैरत की बात तो यह है कि इस दौरान कोई अप्रिय घटना तथा चोरी और गुमशुदगी जैसा भी कोई मामला नहीं होता जबकि कर्बला और नजफ दोनों ही शहर का शुमार रिहायशी और भीड़भाड़ वाले इलाकों में होता है और श्रद्धालू भी अलग अलग महाद्धीप से आए हुए होते हैं।
अरबईन मार्च से जु़ड़ी कई वीडियो फोटो आपको गूगल पर मिल जाएगी जिसे देख आप खुद अंदाजा लगा सकते हैं कि वाकई कितना सलीके से इस आयोजन को अमलीजामा पहनाया जाता है।
अरबईन मार्च मोहब्बत बांटने की जिंदादिल कोशिश है। इमाम हुसैन की शहादत को लोग भुला न बैठें इसलिए ईश्वर ने इस आयोजन की नींव इमाम हुसैन की बहन बीबी ज़ैनब के साथ डाल दी। इस्लाम में शोक को तीन दिन तक मनाने की सलाह दी गई है लेकिन अकेले इमाम हुसैन की शहादत है जिसे चालीस दिन से पहले हरगिज़ कोई भी नहीं बढ़ाता है। जबकि भारत पाकिस्तान समेत अधिकांश देशों विशेष कर शिया समुदाय में यह शोक 2 महीने से अधिक समय तक रहता है।
इस आयोजन को रोकने के लिए साल 2016 से 2019 तक साम्राज्यवाद प्रायोजित आतंकी संगठन आईएसआईएस ने कई कोशिश की लेकिन इस आयोजन पर किसी भी प्रकार का कोई फर्क नहीं पड़ा। कहते हैं कि इस्लाम के लिए अगर इमाम हुसैन ने अपनी शहादत न दी होती तो आज हर कबीले का अलग अलग इस्लाम होता। सब अपने अनुसार और अपनी मनमर्ज़ी अल्लाह को मानते।
अरबईन हर साल यह याद ताज़ा कर देता है कि हज़रत इमाम हुसैन की कुर्बानी को याद रखना हर इंसान की जिम्मेदारी है।


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