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ट्रंप की किरकिरी; पाकिस्तान से किया हार्मुज़ जलडमरूमध्य खोलने का अनुरोध

ट्रंप की किरकिरी; पाकिस्तान से किया हार्मुज़ जलडमरूमध्य खोलने का अनुरोध

मंगलवार रात पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ द्वारा ईरान से हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य खोलने और 45 दिनों के युद्धविराम का अनुरोध सामने आया, लेकिन अब साफ होता जा रहा है कि यह पाकिस्तान की नहीं, बल्कि सीधे तौर पर अमेरिका की सोची-समझी रणनीति थी। दरअसल, वॉशिंगटन अपनी कमजोर पड़ती स्थिति को छिपाने के लिए दूसरे देशों के जरिए अपने एजेंडे को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहा है।

मीडिया रिपोर्ट्स और खासकर फ़िलिस्तीनी पत्रकारों के विश्लेषण ने इस पूरे मामले की परतें खोल दी हैं। शहबाज़ शरीफ़ के ट्वीट के एडिट इतिहास से यह संकेत मिला कि उन्होंने जो संदेश साझा किया, वह मूल रूप से किसी और द्वारा तैयार किया गया ड्राफ्ट था। इतना ही नहीं, उस ट्वीट में “ड्राफ्ट – पाकिस्तान के प्रधानमंत्री का X पर संदेश” जैसी पंक्ति का रह जाना इस बात का साफ सबूत माना जा रहा है कि यह टेक्स्ट सीधे तौर पर उन्हें भेजा गया था और बिना बदलाव के पोस्ट कर दिया गया।

अगर यह वास्तव में पाकिस्तान की स्वतंत्र कूटनीतिक पहल होती, तो इस तरह की तकनीकी और भाषाई गलती की कोई गुंजाइश नहीं रहती। यही वजह है कि अब यह संदेह और गहरा हो गया है कि अमेरिका ने पर्दे के पीछे रहकर पाकिस्तान को एक माध्यम के रूप में इस्तेमाल किया।

विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका इस समय क्षेत्र में अपनी नाकामी और ईरान के बढ़ते प्रभाव से घबराया हुआ है। हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य, जो वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिए बेहद महत्वपूर्ण है, पर नियंत्रण को लेकर अमेरिका लगातार दबाव बनाना चाहता है। लेकिन ईरान ने बार-बार स्पष्ट किया है कि वह अपने राष्ट्रीय हितों और क्षेत्रीय संप्रभुता से कोई समझौता नहीं करेगा।

ईरान के समर्थकों का कहना है कि यह पूरा घटनाक्रम इस बात का प्रमाण है कि अमेरिका अब सीधे दबाव डालने की स्थिति में नहीं रहा, इसलिए वह दूसरे देशों के जरिए अपनी बात मनवाने की कोशिश कर रहा है। वहीं, ईरान ने अब तक जिस मजबूती और आत्मविश्वास के साथ अपने रुख को कायम रखा है, उसने अमेरिका की रणनीति को बार-बार विफल किया है।

इस घटना का सबसे अहम पहलू यह है कि अगर आम जनता को यह स्पष्ट हो जाए कि ऐसी मांगें वास्तव में पाकिस्तान की नहीं, बल्कि ट्रंप प्रशासन की हैं, तो इससे पूरे मामले की गंभीरता और राजनीतिक प्रभाव का आकलन बिल्कुल बदल जाएगा। यह केवल एक कूटनीतिक बयान नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन में हो रहे बदलाव का संकेत भी माना जा रहा है।

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