अमेरिका का सीज़फायर उल्लंघन से खुद को अलग करने का प्रयास
न्यूज़मैक्स ने अमेरिकी सैन्य अधिकारियों के हवाले से दावा किया है कि, युद्ध_विराम शुरू होने के बाद से अमेरिकी सेना ने ईरान में कोई हमला नहीं किया है। इन अधिकारियों का कहना है: “अगर इस समय कोई हमला कर रहा है, तो वह हमारी सेना नहीं है।”
हालांकि, कई विश्लेषकों का मानना है कि युद्धविराम के उल्लंघन में इज़रायल की कार्रवाइयाँ, दोनों पक्षों के बीच काम के बंटवारे (डिवीजन ऑफ लेबर) का हिस्सा हैं, ताकि ईरान के खिलाफ आक्रामकता जारी रखी जा सके।
इस सोच के मुताबिक, अमेरिका सीधे हमले से दूरी बनाकर अंतरराष्ट्रीय दबाव से बचना चाहता है, जबकि इज़रायल के जरिए सैन्य दबाव बनाए रखा जा रहा है। विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि, अमेरिका और इज़रायल को दो अलग-अलग और स्वतंत्र इकाइयों के रूप में पेश करना पूरी तरह वास्तविकता को नहीं दर्शाता।
उनके अनुसार, कई बार दोनों देशों की नीतियाँ और सैन्य लक्ष्य एक-दूसरे से जुड़े होते हैं। इसलिए यह भी संभावना जताई जा रही है कि दोनों के बीच तालमेल के बावजूद सार्वजनिक तौर पर अलग-अलग रुख दिखाना एक तरह की कूटनीतिक रणनीति या “भ्रामक सूचना अभियान” (डिसइन्फॉर्मेशन) हो सकता है, ताकि असली युद्धनीति को छिपाया जा सके।
इसी बीच दक्षिणी लेबनान में इज़रायल के ताज़ा हवाई हमलों की खबरें सामने आई हैं, जिनमें 250 से अधिक लोगों की मौत और 1000 से ज्यादा लोगों के घायल होने की बात कही जा रही है। इन हमलों ने युद्ध_विराम की वास्तविक स्थिति पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं और यह बहस फिर से तेज हो गई है कि क्या वास्तव में क्षेत्र में शांति स्थापित हो रही है या सिर्फ शब्दों के जरिए स्थिति को नियंत्रित दिखाया जा रहा है।
दूसरी ओर, अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस के बयान ने भी इस बहस को और तेज कर दिया है। उन्होंने कहा कि लेबनान में युद्धविराम, ईरान के साथ हुए युद्ध_विराम समझौते का हिस्सा नहीं था। उनके अनुसार, इज़रायल ने केवल लेबनान में “संयम बरतने” की बात मानी थी, न कि पूरी तरह हमले रोकने की।

