बंगाल में 90 लाख नाम हटाए गए, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगाने की जरूरत नहीं समझी: पूर्व न्यायाधीश सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस रोहिंटन फली नरीमन ने विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) से जुड़े मामलों में सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप की आवश्यकता पर ज़ोर देते हुए इस बात पर आश्चर्य व्यक्त किया है कि, पश्चिम बंगाल में 90 लाख मतदाताओं के नाम काट दिए गए, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस पर रोक लगाने की ज़रूरत तक महसूस नहीं की। चुनाव आयोग के कामकाज पर चिंता व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि, “हम ऐसे चुनाव आयोग का बोझ नहीं उठा सकते जो सही तरीक़े से काम न करे।”
नरीमन, जो देश के सॉलिसिटर जनरल भी रह चुके हैं, ने द इंडियन एक्सप्रेस की एक खोजी रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि “मतदान का अधिकार”, जो “हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था के केंद्र में है”, गंभीर ख़तरे में है। वह गुजरात के राजकोट शहर में सी.ए.एम.जे. रिंदानी की जन्मशती स्मृति समारोह को संबोधित कर रहे थे। “संविधान और आम आदमी” विषय पर बोलते हुए जस्टिस नरीमन ने पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से पहले किए गए SIR का जिक्र किया।
उन्होंने कहा, “आप सभी ने देखा कि पश्चिम बंगाल के चुनाव में 90 लाख मतदाता—यह एक चौंका देने वाली संख्या है—मतदान के अधिकार से वंचित हो गए। 90 लाख लोगों का मताधिकार समाप्त कर दिए जाने पर भी सुप्रीम कोर्ट को इतनी चिंता नहीं हुई कि वह इस प्रक्रिया पर रोक लगा देता।”
उन्होंने कहा कि जिन मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए, उनमें से लगभग 22 लाख लोगों ने अपील दायर की, जबकि बाकी लोगों ने अपील नहीं की। उन्होंने कहा कि संभवतः इन लोगों ने स्थिति को स्वीकार कर लिया होगा। शायद वे ग़रीब होंगे और उनके पास वे संसाधन या न्याय तक पहुंच नहीं होगी, जो दूसरों को उपलब्ध है।
सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश ने कहा, “हमारे संविधान और हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था की नींव—यानी मतदान का अधिकार—गंभीर ख़तरे में है। मुझे उम्मीद है कि सुप्रीम कोर्ट, जिसका मैं कभी हिस्सा रहा हूं, तुरंत हस्तक्षेप करेगा और इन मामलों को ठीक करेगा। हम ऐसा चुनाव आयोग नहीं रख सकते जो इस तरह काम करे या इससे भी बदतर तरीके से काम करे। यह चौंकाने वाला है।”
उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि नागरिकों को उनके मतदान के अधिकार से वंचित करना गैरकानूनी है। चुनाव आयुक्त और मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति से संबंधित कानून के खिलाफ दायर याचिका का भी हवाला देते हुए जस्टिस नरीमन ने कहा, “जितनी जल्दी संवैधानिक पीठ इस मामले पर फैसला सुनाए, उतना ही बेहतर होगा।”
यह कहते हुए कि “आज हमारे देश में बेहद चिंताजनक घटनाएं हो रही हैं”, वरिष्ठ कानूनविद् ने कहा कि, उतनी ही चिंता की बात यह भी है कि अन्य चुनाव आयुक्तों ने 14 बार आपत्ति दर्ज कराई, लेकिन उन्होंने नए क़ानून की धारा 18 के तहत निर्णय लागू करने से पहले मतदान के अधिकार का इस्तेमाल नहीं किया, ताकि बहुमत की राय प्रभावी हो जाती।

