इज़रायल को बचाने के लिए ट्रंप ने फिर किया सीज़फायर का नाटक
मिडिल ईस्ट में चल रहा यह युद्ध अब सिर्फ हथियारों की लड़ाई नहीं रहा, बल्कि सच और झूठ के बीच की जंग बन चुका है। एक तरफ ईरान है, जो लगातार हमलों के बावजूद झुकने को तैयार नहीं, और दूसरी तरफ डोनाल्ड ट्रंप और बेंजामिन नेतन्याहू जैसे नेता हैं, जो हर बार “सीज़फायर” के नाम पर दुनिया को गुमराह करने की कोशिश करते हुए दिखाई देते हैं।
ताज़ा घटनाओं में ट्रंप ने एक बार फिर सीज़फायर जैसी बातों का शोर मचाया है, लेकिन हकीकत यह है कि यह कोई शांति प्रयास नहीं, बल्कि एक रणनीतिक चाल है। आज उन्होंने ईरान पर हमलों को कुछ दिनों के लिए टालने की बात कही और “प्रोडक्टिव बातचीत” का दावा किया। लेकिन ईरान ने साफ शब्दों में इन दावों को खारिज कर दिया, यह बताते हुए कि ऐसी कोई सीधी बातचीत ही नहीं हो रही।
सवाल यह उठता है कि अगर बातचीत ही नहीं हो रही, तो ट्रंप किस “सीज़फायर” की बात कर रहे हैं? जवाब साफ है—यह सिर्फ एक सियासी नाटक है।
ईरानी मिसाइलों ने इस पूरे खेल को पलट दिया है। जब तक हमला एकतरफा था, तब तक अमेरिका और इज़रायल आक्रामक बने रहे। लेकिन जैसे ही ईरान ने जवाब देना शुरू किया, और इज़रायल के भीतर डर और तबाही की तस्वीरें सामने आने लगीं, तभी अचानक “सीज़फायर” की बातें शुरू हो गईं। यह विरोधाभास दिखाता है कि, असल मक़सद शांति नहीं, बल्कि अपने सहयोगी इज़रायल को संभलने का मौका देना है।
पिछले साल का तथाकथित “12 दिवसीय युद्ध” इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। उस समय भी ट्रंप ने अचानक सीज़फायर का ऐलान कर दिया था, जबकि न तो ईरान ने इसे स्वीकार किया था और न ही जमीन पर हमले रुके थे। यहां तक कि, इज़रायल ने खुद ही कुछ घंटों बाद हमले फिर से शुरू कर दिए थे। यानी सीज़फायर सिर्फ कागज़ी था—असलियत में युद्ध जारी था। आज भी वही स्क्रिप्ट दोहराई जा रही है।
ईरान का रुख साफ है—वह दबाव में झुकने वाला देश नहीं है। उसने स्पष्ट कर दिया है कि अगर उस पर हमला होगा, तो जवाब भी उसी ताकत से दिया जाएगा। यही कारण है कि आज ईरान सिर्फ बचाव नहीं कर रहा, बल्कि पूरे क्षेत्र में शक्ति संतुलन को चुनौती दे रहा है।
इसके उलट, नेतन्याहू और ट्रंप की रणनीति पूरी तरह अवसरवादी नजर आती है। पहले आक्रामक हमले, फिर जब हालात बिगड़ने लगें तो “सीज़फायर” का नाटक—यह दोहरा रवैया अब दुनिया के सामने उजागर हो चुका है।
सच्चाई यह है कि अगर वास्तव में शांति चाहिए, तो पहले आक्रामक नीतियों को रोकना होगा। लेकिन जब तक राजनीति और ताकत का खेल चलता रहेगा, तब तक “सीज़फायर” सिर्फ एक शब्द रहेगा—जिसका इस्तेमाल केवल भ्रम फैलाने के लिए किया जाएगा।
इस पूरे संघर्ष ने एक बात साफ कर दी है—ईरान अब डरने वाला नहीं है, और ट्रंप-नेतन्याहू की सियासत अब उतनी प्रभावी नहीं रही जितनी पहले थी।

