ट्रंप और नेतन्याहू के बीच ईरान पर दबाव बढ़ाने पर सहमति: इज़रायली मीडिया
इज़रायल के चैनल 12 ने शनिवार को दावा किया कि डोनाल्ड ट्रंप और बेंजामिन नेतन्याहू की मुलाकात में दोनों नेताओं ने ईरान पर “आर्थिक और कूटनीतिक दबाव” बढ़ाने पर सहमति जताई। रिपोर्ट के मुताबिक नेतन्याहू ने कथित तौर पर कहा कि ईरान के साथ कोई भी समझौता “गैर-यथार्थवादी” होगा और तेहरान उसका पालन नहीं करेगा।
यह बयान अपने आप में विडंबनापूर्ण है, क्योंकि 2015 के परमाणु समझौते यानी Joint Comprehensive Plan of Action से अलग होने का फैसला खुद ट्रंप प्रशासन ने लिया था, जबकि अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों की रिपोर्टें बताती रही हैं कि ईरान उस समझौते के दायरे में काम कर रहा था।
ट्रंप द्वारा एकतरफा तरीके से समझौते से बाहर निकलना और फिर कठोर प्रतिबंध लगाना, क्षेत्र में तनाव बढ़ाने का कारण बना। इसके बावजूद आज ईरान को ही अविश्वसनीय बताना राजनीतिक सुविधा तो हो सकती है, नैतिक मजबूती नहीं।
नेतन्याहू का यह कहना कि किसी भी संभावित समझौते में ईरान के मिसाइल कार्यक्रम और उसके क्षेत्रीय सहयोगियों को भी शामिल किया जाए, असल में वार्ता को जटिल बनाने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। ईरान ने साफ कहा है कि बातचीत केवल परमाणु मुद्दे तक सीमित रहेगी।
सवाल यह है कि क्या लगातार दबाव, प्रतिबंध और धमकियों से कोई स्थायी समाधान निकलेगा, या फिर इससे क्षेत्रीय अस्थिरता ही बढ़ेगी? ईरान का रुख यह रहा है कि वह अपनी संप्रभुता और राष्ट्रीय हितों से समझौता नहीं करेगा। ऐसे में कूटनीति को कमजोर कर दबाव की नीति अपनाना शांति की दिशा में कदम नहीं, बल्कि टकराव की जमीन तैयार करना लगता है।

