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ग़ाज़ा से पीछे हटने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा: पूर्व इज़रायली सेना प्रमुख

ग़ाज़ा से पीछे हटने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा: पूर्व इज़रायली सेना प्रमुख

गादी आइज़नकॉट, जो 2015 से 2019 तक इज़रायली सेना के चीफ़ ऑफ़ स्टाफ रह चुके हैं, ने हाल के दिनों में ग़ाज़ा में आठ इज़रायली सैनिकों की मौत को एक “स्पष्ट रणनीतिक योजना की कमी” का नतीजा बताया है और कहा है कि मौजूदा हालात में ग़ाज़ा से पीछे हटने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा है।

उन्होंने, जो युद्ध की शुरुआत में नेतन्याहू सरकार के “युद्ध कैबिनेट” के सदस्य थे, इज़रायली चैनल 12 को दिए एक इंटरव्यू में कहा: “इस सप्ताह आठ सैनिकों की मौत और 7 अक्टूबर से अब तक की नाकाम नेतृत्व नीति से कोई उपलब्धि हासिल नहीं हुई है। आइज़नकॉट ने ज़ोर देकर कहा कि “इस युद्ध के पीछे कोई रणनीतिक योजना नहीं है, न ही कोई राजनीतिक और सैन्य समन्वय, बल्कि फैसले दबाव और बग़ैर तैयारी के लिए जा रहे हैं।”

नेतन्याहू के कट्टर विरोधी आइज़नकॉट ने आगे कहा:
“जब आप देखते हैं कि सैनिकों को ग़ैर-ज़िम्मेदार फैसलों की वजह से जान जोखिम में डालनी पड़ रही है, तो पीछे हटना ही एकमात्र रास्ता बचता है। इससे पहले भी उन्होंने बिनी गैंट्ज़ के साथ एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा था: “इज़रायल अब पतन की ओर बढ़ रहा है और घोषित युद्ध उद्देश्यों में से कोई भी लक्ष्य हासिल नहीं कर पाया है।”

अल-क़स्साम ब्रिगेड्स ने घोषणा की है कि 3 से 7 जून 2025 के बीच की कार्रवाइयों में, ग़ाज़ा के उत्तरी इलाक़ों समेत कई क्षेत्रों में 11 इज़रायली सैनिक मारे गए हैं और 12 घायल हुए हैं।

फिलिस्तीनी राजनीतिक विश्लेषक वेसाम अफीफ़ा ने शहाब न्यूज़ से कहा:
“मुक़ाबला कर रही ताक़तें ‘रणनीतिक धैर्य’ और ‘ठीक समय पर हमला’ जैसी रणनीति अपना रही हैं, ताकि दुश्मन को भ्रम में रखा जाए। जब इज़रायली सेना खुद को सुरक्षित समझती है, तभी अचानक हमले किए जाते हैं। ये आमतौर पर नज़दीकी घात या एक साथ होने वाली आग की कार्रवाइयाँ होती हैं।”

फिलिस्तीनी विश्लेषक मोहम्मद अल-मदहून का कहना है कि जबालिया और शुजाइया की लड़ाइयाँ यह दिखा रही हैं कि अब प्रतिरोध रक्षात्मक नहीं, बल्कि संगठित आक्रामक अवस्था में बदल चुका है। उन्होंने सोशल मीडिया मंच X पर लिखा:
“ग़ाज़ा की गलियाँ अब आग का जाल बन चुकी हैं जहाँ इज़रायली विशेष बल घातक बमों और ड्रोन हमलों में फँस रहे हैं।”

उन्होंने यह भी कहा कि इज़रायली सेना मैदानी तौर पर अफ़रा तफ़री और अस्थिरता का शिकार हो गई है और अपनी छवि सुधारने के लिए मीडिया पर चुप्पी साधने की नीति भी नाकाम हो चुकी है। रामी अबू ज़ुबैदा, जो एक जॉर्डन के सैन्य और सुरक्षा मामलों के विशेषज्ञ हैं, ने अल-जज़ीरा से कहा:

“हालिया कार्रवाइयाँ यह दिखा रही हैं कि प्रतिरोध की योजना और अमल में एक नया गुणवत्ता-स्तर आया है। इसके चलते इज़रायल अब एक रणनीतिक गतिरोध में फँस चुका है। तकनीकी बढ़त होने के बावजूद वो अपने सैनिकों को सुरक्षित नहीं रख पा रहा। दूसरी ओर, ग़ाज़ा ने एक बार फिर यह साबित किया है कि वह संघर्ष की परिभाषा को नए औज़ारों से फिर से गढ़ सकता है।”

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