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प्रतिरोध कम समय में अपनी ताक़त फिर से हासिल करने की क्षमता साबित कर चुका है: हिज़्बुल्लाह

प्रतिरोध कम समय में अपनी ताक़त फिर से हासिल करने की क्षमता साबित कर चुका है: हिज़्बुल्लाह

लेबनान की संसद में हिज़्बुल्लाह के प्रतिनिधि ने एक बार फिर यह स्पष्ट किया है कि उनके अनुसार “प्रतिरोध की विचारधारा में ऐसी कोई अवधारणा नहीं है जिसमें दुश्मन द्वारा थोपे गए सीमांकन या ज़बरन बनाए गए बफर ज़ोन को स्वीकार किया जाए।” यह बयान ऐसे समय में आया है जब क्षेत्र में तनाव और सुरक्षा संबंधी बहसें लगातार तेज़ हो रही हैं।

संसद में “वफ़ादारी टू रेज़िस्टेंस” गुट के सदस्य हसन इज़्ज़ुद्दीन ने कहा कि “प्रतिरोध ने पहले भी मुश्किल परिस्थितियों में अपनी क्षमताओं को पुनः स्थापित करने की क्षमता दिखाई है।” उनका दावा है कि संगठन ने विभिन्न चरणों में अपनी रणनीतियों और तरीकों को बदलते हुए खुद को अनुकूलित किया है, जिससे वह अपने विरोधियों के लिए अप्रत्याशित बना रहता है।

उन्होंने यह भी कहा कि “प्रतिरोध की यह मानसिकता केवल सैन्य पहलुओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक व्यापक सामाजिक और राजनीतिक दृष्टिकोण का हिस्सा है, जो बाहरी दबावों के बावजूद कायम रहता है।” उनके अनुसार, चाहे चुनौतियाँ कितनी भी बढ़ जाएँ, इस सोच को कमजोर करना आसान नहीं है।

यह बयान लेबनान और व्यापक मध्य-पूर्व क्षेत्र में जारी तनाव, सीमा विवादों और सुरक्षा व्यवस्थाओं पर चल रही चर्चाओं के बीच आया है। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे बयानों का उद्देश्य समर्थकों का मनोबल बनाए रखना और राजनीतिक संदेश देना भी होता है, जबकि आलोचक इसे क्षेत्र में तनाव बढ़ाने वाला मानते हैं।

क्षेत्रीय परिदृश्य में, हिज़्बुल्लाह की भूमिका लंबे समय से विवाद और बहस का विषय रही है—जहाँ एक ओर इसे कुछ लोग “प्रतिरोध” के रूप में देखते हैं, वहीं कई देश और विश्लेषक इसे एक सशस्त्र संगठन के रूप में देखते हैं। ऐसे में इस तरह के बयान मध्य-पूर्व की जटिल राजनीति और सुरक्षा समीकरणों को और उजागर करते हैं।

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