कुवैत के आसमान में गिरे फाइटर जेट ने अरब देशों की पोल खोल दी
अगर खाड़ी देश बार-बार यह दावा कर रहे हैं कि उन्होंने ईरान के ख़िलाफ़ किसी भी सैन्य कार्रवाई के लिए न तो अपनी ज़मीन दी है और न ही हवाई रास्ता, तो आज सुबह कुवैत के आसमान में एक फाइटर जेट का क्रैश होना कई गंभीर सवाल खड़े करता है। यह महज़ एक “तकनीकी दुर्घटना” नहीं, बल्कि उस दोहरे रवैये की झलक है जो लंबे समय से अरब राजशाहियों की नीति का हिस्सा रहा है।
खाड़ी देशों की सरकारें सार्वजनिक मंचों पर तटस्थता और शांति की बातें करती हैं, लेकिन ज़मीनी हकीकत इससे बिल्कुल अलग दिखाई देती है। अगर वास्तव में किसी भी प्रकार का सैन्य सहयोग नहीं दिया गया, तो कुवैत के हवाई क्षेत्र में सैन्य जेट की मौजूदगी क्या संकेत देती है? क्या यह जेट प्रशिक्षण उड़ान पर था, या किसी ऐसे मिशन का हिस्सा था जिसे जनता से छुपाया जा रहा है?
यह पहला मौका नहीं है जब अरब देशों की कथनी और करनी में फर्क सामने आया हो। बीते वर्षों में भी कई बार यह सामने आता रहा है कि खाड़ी क्षेत्र की हवाई सीमाएं गुपचुप तरीके से पश्चिमी और ज़ायोनी सैन्य अभियानों के लिए इस्तेमाल होती रही हैं, जबकि आधिकारिक बयान इसके उलट होते हैं। यह दोहरापन न सिर्फ क्षेत्रीय शांति के लिए ख़तरनाक है, बल्कि अरब जनता के भरोसे के साथ भी खुला धोखा है।
ईरान के ख़िलाफ़ साजिशों में अप्रत्यक्ष भागीदारी करके ये देश खुद को “मध्यस्थ” और “शांति-प्रिय” दिखाने की कोशिश करते हैं, जबकि हकीकत में वे आग में घी डालने का काम कर रहे हैं। ईरान पर दबाव बनाने की हर कोशिश पूरे पश्चिम एशिया को युद्ध की आग में झोंक सकती है, जिसका खामियाज़ा सबसे पहले आम अरब नागरिकों को ही भुगतना पड़ेगा।
आज कुवैत के आसमान में गिरा फाइटर जेट सिर्फ़ एक विमान नहीं था; वह अरब शासकों की नीतियों का गिरता हुआ मुखौटा था। अब वक्त है कि खाड़ी देशों की जनता सवाल करे—क्या उनकी ज़मीन और आसमान वाकई उनकी अपनी संप्रभुता में हैं, या फिर विदेशी ताक़तों के युद्धक नक्शों का हिस्सा बन चुके हैं?

