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ग़ाज़ा की तबाही, ईरान की तन्हाई और अरब शासकों की खामोशी—कब जागेगा ज़मीर?”

ग़ाज़ा की तबाही, ईरान की तन्हाई और अरब शासकों की खामोशी—कब जागेगा ज़मीर?”

आज का मध्य-पूर्व एक कड़वा और बेचैन कर देने वाला सच सामने रखता है—जहाँ एक तरफ़ इंसानियत तड़प रही है, वहीं दूसरी तरफ़ ताक़तवर देश और खामोश सरकारें इस दर्द को और गहरा कर रही हैं। ग़ाज़ा में जारी तबाही ने पूरी दुनिया को झकझोर दिया है, लेकिन इसके बावजूद अमेरिकाऔर इज़रायल की नीतियाँ, और कई अरब देशों की चुप्पी इस त्रासदी को और भयावह बना रही है।

ग़ाज़ा में जो कुछ हुआ, वह केवल एक युद्ध नहीं है—यह इंसानियत की हार की एक जीवित तस्वीर बन चुका है। घर उजड़ गए, अस्पताल मलबे में बदल गए, और मासूम बच्चे जिंदगी और मौत के बीच दबकर रह गए। लोगों को भूख, प्यास और बेबसी के हवाले कर दिया गया। लेकिन इन सबके बीच सबसे बड़ा सवाल यही है—दुनिया की ताकतवर सरकारें आखिर कर क्या रही हैं?

United States, जो खुद को मानवाधिकारों का सबसे बड़ा रक्षक बताता है, इस पूरे मामले में खुलकर Israel के साथ खड़ा दिखाई देता है। हर अंतरराष्ट्रीय मंच पर उसका समर्थन, सैन्य मदद, और कूटनीतिक सुरक्षा—ये सब इस बात का संकेत देते हैं कि नैतिकता से ज्यादा उसके लिए रणनीतिक हित मायने रखते हैं। वही अमेरिका, जो दुनिया को इंसाफ और लोकतंत्र का पाठ पढ़ाता है, अपने सहयोगी के मामले में खामोशी और पक्षपात का परिचय देता है।

मध्य-पूर्व में फैले अमेरिकी एयरबेस इस हकीकत को और स्पष्ट करते हैं। ये ठिकाने सिर्फ “सुरक्षा” के लिए नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र पर प्रभाव और नियंत्रण बनाए रखने के औजार बन चुके हैं। कई अरब देशों की जमीन पर मौजूद ये सैन्य अड्डे यह दिखाते हैं कि किस तरह क्षेत्रीय राजनीति बाहरी ताकतों के इशारों पर चल रही है।

लेकिन इससे भी बड़ा और असहज सवाल अरब देशों पर उठता है। वे देश, जो खुद को इस्लामी दुनिया का प्रतिनिधि बताते हैं, आखिर क्यों इस अन्याय के खिलाफ मजबूती से खड़े नहीं होते? क्यों उनकी आवाज इतनी धीमी और बिखरी हुई हथी, जब ग़ाज़ा में इंसानियत दम तोड़ रही थी? अमेरिका और इज़रायल द्वारा जब ईरान इनके एयरबेस से ईरान पर हमला किया गया तब ये अरब देश ख़ामोश तमाशाई क्यों बने हुए थे??मीनाब स्कूल में अमेरिका और इज़रायल द्वारा किए गए वहशियाना हमलों पर जिसमें 170 छात्राओं की शहादत हो गई इन बेग़ैरत अरब शासकों के मुंह पर ताले क्यों लगे हुए थे??

सबसे अहम सवाल यह है कि, जब इन अरब शासकों को ग़ाज़ा और ईरान के समर्थन में बोलना ही नहीं है तो फिर, ये अमेरिका और इज़रायल से हथियार क्यों ख़रीद रहे हैं??

सच्चाई कड़वी है—कई अरब सरकारें अपने स्वार्थ, सत्ता और डर के कारण झुक चुकी हैं। उन्हें डर है कि अगर वे अमेरिका का विरोध करेंगे, तो उनकी राजनीतिक स्थिरता और आर्थिक हित खतरे में पड़ सकते हैं। इसी डर ने उन्हें खामोश कर दिया है। और अब यह बात और भी स्पष्ट हो चुकी है कि केवल खामोशी ही नहीं, बल्कि सक्रिय सहयोग भी सामने आया है।

ईरान पर हुए हमलों में कई अरब देशों की जमीन और उनके हवाई क्षेत्र का खुलकर इस्तेमाल किया गया। यह केवल एक रणनीतिक सहयोग नहीं, बल्कि एक ऐसा कदम है जो पूरे क्षेत्र की नैतिक स्थिति पर सवाल खड़ा करता है। जब किसी देश पर हमला हो और पड़ोसी अपनी जमीन और आसमान हमलावरों के लिए खोल दें, तो यह सिर्फ राजनीति नहीं—बल्कि एक गंभीर नैतिक गिरावट का संकेत होता है।

सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि, यह सब उस समय हो रहा है, जब ईरान लगातार फिलिस्तीन के समर्थन में आवाज उठा रहा है। ईरान ने बार-बार ग़ाज़ा के लोगों के लिए समर्थन जताया, अंतरराष्ट्रीय मंचों पर आवाज उठाई, लेकिन अरब देशों ने उसका साथ देने के बजाय उसे लगभग अकेला छोड़ दिया। न कोई ठोस सामूहिक रणनीति, न कोई मजबूत एकजुटता—सिर्फ बयान और खामोशी।

इसके उलट, कुछ अरब देशों ने न केवल दूरी बनाई, बल्कि अप्रत्यक्ष रूप से United States और Israel को ईरान के खिलाफ अपनी जमीन और हवाई क्षेत्र इस्तेमाल करने की अनुमति देकर स्थिति को और जटिल बना दिया।

अब एक और दर्दनाक सवाल सामने आता है—

जब “मीनाब” के एक स्कूल में 170 मासूम छात्राओं की मौत की खबर आई, तब भी अरब दुनिया का खून क्यों नहीं खौला?

क्या बच्चों की मौत भी उन्हें झकझोर नहीं सकी?

क्या मासूम जिंदगियों की कोई कीमत नहीं रह गई?

यह खामोशी अब केवल कमजोरी नहीं रही—यह एक तरह की संवेदनहीनता और बेपरवाही में बदलती जा रही है। एक तरफ मंचों से फिलिस्तीन के समर्थन में बड़े-बड़े बयान दिए जाते हैं, और दूसरी तरफ जमीन पर कोई ठोस कदम नहीं उठाया जाता। यह दोहरापन अब छिपा नहीं है—यह खुलकर सामने आ चुका है।

इज़रायल की कार्रवाइयों ने ग़ाज़ा को लगभग पूरी तरह तबाह कर दिया है। अस्पताल, स्कूल, घर—कुछ भी सुरक्षित नहीं बचा। लोगों को बुनियादी जरूरतों से भी वंचित कर दिया गया। लेकिन हर बार अमेरिका उसके साथ खड़ा रहा—उसे बचाता रहा, उसे मजबूत करता रहा।

अगर अरब देश सच में एकजुट होते, तो हालात अलग हो सकते थे। लेकिन उन्होंने अपने हितों को इंसानियत से ऊपर रखा। उन्होंने दबाव स्वीकार किया, अपनी जमीन और हवाई क्षेत्र उपलब्ध कराया, और इस पूरे संकट में एक तरह से अप्रत्यक्ष भागीदार बन गए।

आज की सच्चाई बेहद साफ है—

जिस ईरान ने फिलिस्तीन के लिए आवाज उठाई, उसे अकेला छोड़ दिया गया; और जिन पर अत्याचार के आरोप हैं, उन्हें सहयोग दिया गया। यह केवल राजनीति नहीं, बल्कि इतिहास का एक काला अध्याय बनता जा रहा है।

अंत में, यह सवाल हर इंसान के दिल में गूंज रहा है—

कब जागेगा ज़मीर?

कब इंसानियत, सत्ता और स्वार्थ पर भारी पड़ेगी?

अगर आज भी यह खामोशी जारी रही, तो आने वाली पीढ़ियाँ यही पूछेंगी—

जब मासूम मर रहे थे, तब दुनिया क्यों चुप थी?

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