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आज़ादी पसंद ‘समूद’ कारवां के सदस्यों का अपहरण अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद का उदाहरण है: सरदार क़ानी

आज़ादी पसंद ‘समूद’ कारवां के सदस्यों का अपहरण अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद का उदाहरण है: सरदार क़ानी

ग़ाज़ा पर जारी हमलों, नाकेबंदी और मानवीय संकट ने पूरी दुनिया के संवेदनशील लोगों को झकझोर दिया है। लगातार हो रही बमबारी, अस्पतालों, राहत शिविरों और नागरिक इलाक़ों पर हमलों के आरोपों ने इज़रायल की सैन्य कार्रवाइयों पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। सबसे अधिक पीड़ा उन मासूम बच्चों, महिलाओं और बुज़ुर्गों को झेलनी पड़ रही है, जिनका इस संघर्ष से कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं है, फिर भी वे हिंसा और भय के साये में जीवन बिताने को मजबूर हैं।

ऐसे समय में दुनिया भर से उठने वाली आवाज़ें यह संदेश दे रही हैं कि मानवाधिकार, न्याय और अंतरराष्ट्रीय क़ानून किसी एक राष्ट्र या समुदाय के लिए नहीं, बल्कि समूची मानवता के लिए हैं। यदि किसी क्षेत्र की घेराबंदी के कारण भोजन, दवा और मूलभूत आवश्यकताओं की आपूर्ति बाधित होती है, तो उसका सबसे बड़ा असर आम नागरिकों पर पड़ता है। यह स्थिति केवल राजनीतिक विवाद नहीं रह जाती, बल्कि एक गहरे मानवीय संकट का रूप ले लेती है।

इतिहास गवाह है कि सैन्य शक्ति स्थायी शांति नहीं ला सकती। शांति का रास्ता न्याय, संवाद और मानवीय गरिमा के सम्मान से होकर गुजरता है। ग़ाज़ा के पीड़ित लोगों के साथ एकजुटता जताना किसी राजनीति का समर्थन नहीं, बल्कि इंसानियत के पक्ष में खड़े होने का प्रतीक है। दुनिया की सामूहिक अंतरात्मा यही पुकार रही है कि निर्दोषों का रक्तपात रुके और अत्याचार के स्थान पर न्याय और अमन की स्थापना हो।

इस्माइल क़ानी, जो इस्लामी क्रांति रक्षक कोर की कुद्स फ़ोर्स के कमांडर हैं, ने कहा कि आज़ादीपसंद ‘समूद’ कारवां के साथ ज़ायोनी अपराधियों द्वारा किया गया टकराव और उसके सदस्यों का अपहरण, अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद का स्पष्ट उदाहरण है।

उन्होंने कहा कि ग़ाज़ा के मज़लूम लोगों की नाकेबंदी तोड़ने तथा फ़िलिस्तीनी बच्चों और महिलाओं को इज़रायली अत्याचारों से बचाने के लिए ‘समूद’ के आज़ादीपसंद कार्यकर्ताओं द्वारा किया जा रहा संघर्ष, दुनिया भर के लोगों की ज़ालिम और मासूम बच्चों के हत्यारे ज़ायोनी तत्वों के विरुद्ध बढ़ते वैश्विक प्रतिरोध आंदोलन का प्रतीक है।

सरदार क़ानी ने आगे कहा कि ज़ायोनी ताक़तों के कायरतापूर्ण अपराध, दुनिया भर के आज़ादीपसंद लोगों के इरादों को और अधिक मज़बूत करेंगे तथा वे ग़ाज़ा के पीड़ित लोगों की नाकेबंदी तोड़ने के लिए पहले से अधिक दृढ़ संकल्प के साथ आगे बढ़ेंगे।

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