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हिज़्बुल्लाह के डर से लेबनान में इज़रायली सैनिकों की संख्या में कमी

हिज़्बुल्लाह के डर से लेबनान में इज़रायली सैनिकों की संख्या में कमी

हिब्रू अख़बार «मारीव» ने अपने सैन्य संवाददाता आवी अश्कनाज़ी के हवाले से लिखा:

“इज़रायली सेना ने कल लेबनान में अपने सैनिकों की संख्या कम करने की प्रक्रिया जारी रखी, क्योंकि उसे यह एहसास हो गया है कि बड़ी संख्या में ज़मीनी सैनिकों की मौजूदगी उनकी जान को ख़तरे में डाल सकती है।”

अश्कनाज़ी ने अपने लेख के एक अन्य हिस्से में लिखा:

“अगर सेना की विफलताओं, उसकी तैयारियों के स्तर और राजनीतिक नेतृत्व की स्थिति पर बात करनी है, तो दो अहम बिंदुओं पर ध्यान देना होगा।

पहला, ‘हित्स’ (Arrow) मिसाइल रक्षा प्रणाली के मिसाइल भंडार का मुद्दा, जिसे बढ़ाने से राजनीतिक नेतृत्व लंबे समय तक बचता रहा है। दूसरा, फाइबर-ऑप्टिक तकनीक से निर्देशित आत्मघाती ड्रोन से निपटने की तैयारी, जो अब तक इज़रायली सेना में हताहतों का कारण बन चुके हैं। ख़तरों का सामना करने के उपायों को आख़िरी क्षण तक टालते रहने की इज़रायली सोच अंततः भूकंप जैसी बड़ी त्रासदी में बदल सकती है — और यह एक वास्तविकता है।”

इज़रायली मीडिया में प्रकाशित हालिया रिपोर्टें इस ओर संकेत करती हैं कि लेबनान सीमा पर बदलते हालात ने इज़रायल की सैन्य रणनीति को चुनौतीपूर्ण मोड़ पर ला खड़ा किया है। रिपोर्ट के अनुसार, दक्षिण लेबनान के सीमावर्ती इलाक़ों में इज़रायली सैनिकों की संख्या में लगातार कमी की जा रही है।

विश्लेषकों का कहना है कि बड़ी संख्या में ज़मीनी सैनिकों की तैनाती अब पहले जैसी रणनीतिक बढ़त देने के बजाय सुरक्षा जोखिम बढ़ा सकती है, क्योंकि सीमा पार से होने वाले अचानक हमले, ड्रोन गतिविधियाँ और असममित युद्धक तकनीकें पारंपरिक सैन्य ढाँचे के लिए गंभीर चुनौती बनकर उभरी हैं।

राजनीतिक स्तर पर भी यह बहस तेज़ हुई है कि सुरक्षा चुनौतियों को समय रहते गंभीरता से न लेने की नीति भविष्य में बड़े संकट को जन्म दे सकती है। इस घटनाक्रम ने यह स्पष्ट कर दिया है कि आधुनिक संघर्ष केवल पारंपरिक हथियारों से नहीं, बल्कि तकनीकी श्रेष्ठता, खुफिया क्षमता और रणनीतिक तैयारी से भी तय होते हैं।

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