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सऊदी को सैन्य सहायता देना इस्राईल के लिए एक “ख़तरनाक जाल” साबित हो सकता है: इस्राईली अख़बार

सऊदी को सैन्य सहायता देना इस्राईल के लिए एक “ख़तरनाक जाल” साबित हो सकता है: इस्राईली अख़बार

इस्राईली अख़बार ‘मआरिव’ ने चेतावनी दी है कि इस्राईल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू, सऊदी अरब और हूतियों के बीच चल रहे संघर्ष में संभावित हस्तक्षेप के ज़रिए, इस्राईल को ऐसे युद्ध में धकेल सकते हैं जिसका उससे कोई संबंध नहीं है। अख़बार के अनुसार, नेतन्याहू सऊदी अरब के साथ संबंध सुधारने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन इस कोशिश में सऊदी अरब को सैन्य सहायता देना इस्राईल के लिए एक “ख़तरनाक जाल” साबित हो सकता है।

इस्राईल सऊदी अरब के साथ संबंध सुधारने की कोशिश में

‘मआरिव’ के अनुसार, इस्राईल इस समय सऊदी अरब के साथ अपने संबंधों को फिर से सुधारने पर ध्यान केंद्रित कर रहा है। अख़बार का कहना है कि नेतन्याहू ने अपने पुराने रुख़ से हटकर कदम उठाया है। रियाद के हवाई अड्डे पर हमले के बाद उन्होंने एक आधिकारिक बयान जारी किया, जिसमें उन्होंने मिसाइल हमले पर अफ़सोस जताया और मृतकों तथा घायलों के परिवारों के प्रति संवेदना व्यक्त की।

अख़बार के मुताबिक़, इस बयान का एक ओर आधिकारिक महत्व था, तो दूसरी ओर इसके ज़रिए सऊदी अरब को यह संदेश भी दिया गया कि “हम यहाँ हैं, आपके साथ खड़े हैं।” हालाँकि, सऊदी अरब की ओर से इस बयान पर कोई सार्वजनिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई।

ग़ौरतलब है कि ऐसी ख़बरें सामने आई हैं कि सऊदी अरब की तेल और गैस सुविधाओं तथा रियाद के हवाई अड्डे को निशाना बनाए जाने के बाद इस्राईल, युद्ध में हस्तक्षेप करने और सऊदी अरब को सहायता देने पर विचार कर रहा है। ये हमले यमन पर सऊदी अरब की आक्रामक कार्रवाई के जवाब में यमन के सशस्त्र बलों द्वारा किए गए थे।

ट्रंप, नेतन्याहू और साझा हित

अख़बार के अनुसार, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और बेंजामिन नेतन्याहू के साझा हित हैं। दोनों ही चाहते हैं कि ‘अब्राहम समझौतों’ का दायरा बढ़ाया जाए। ‘मआरिव’ के मुताबिक़, ट्रंप के पहले कार्यकाल में व्हाइट हाउस की सबसे बड़ी उपलब्धियों में इन समझौतों को गिना जाता है।

नेतन्याहू इन समझौतों को एक अद्वितीय राजनीतिक और आर्थिक अवसर के रूप में देखते हैं। उन्हें लगता है कि इस तरह का समझौता करने का यह शायद आख़िरी अवसर हो सकता है। वर्ष 2023 में इस्राईल सऊदी अरब के साथ समझौता करने के क़रीब पहुँच गया था, लेकिन 7 अक्टूबर को शुरू हुए ‘ऑपरेशन तूफ़ान अल-अक़्सा’ के बाद यह प्रक्रिया बाधित हो गई।

अब इस्राईल एक बार फिर अपना रुख़ बदलकर बातचीत करने की कोशिश कर रहा है। लेकिन अख़बार के अनुसार, अपनी सैन्य क्षमताओं के बावजूद तेल अवीव अब तक सऊदी अरब के दरवाज़े अपने लिए नहीं खोल पाया है।

‘मआरिव’ का कहना है कि इसकी एक वजह यह है कि “ताक़त का नशा चढ़ जाता है, लेकिन यह गुमराह भी करती है।” केवल सैन्य शक्ति के दम पर सऊदी अरब को यह विश्वास नहीं दिलाया जा सकता कि उसके हित इस्राईल के हितों से मेल खाते हैं।

अख़बार ने यह भी याद दिलाया कि, इस्राईल पहले भी राजनीतिक उद्देश्यों को हासिल करने के लिए सैन्य शक्ति का इस्तेमाल करने में नाकाम रहा है। इसके उदाहरण के तौर पर उसने सिनाई का ज़िक्र किया, जहाँ से इस्राईल को एक अपमानजनक क़दम के तहत पीछे हटना पड़ा। इसके अलावा, वर्ष 1982 में लेबनान और सीरिया का भी उल्लेख किया गया।

रियाद की ओर से एक “मुस्कान” पाने के लिए?

‘मआरिव’ के अनुसार, सऊदी अरब के लिए नेतन्याहू का मौजूदा क़दम एक बड़ा जोखिम है। इसका उद्देश्य रियाद से एक “मुस्कान, सद्भावना के संकेत या सकारात्मक प्रतिक्रिया” हासिल करना हो सकता है। संभव है कि वह इसके ज़रिए अमेरिका से भी समर्थन प्राप्त करना चाहते हों।

नेतन्याहू सऊदी अरब से कह सकते हैं कि अमेरिकी आपका समर्थन करने में हिचकिचा रहे हैं, लेकिन “हम हिचकिचाते नहीं हैं और आपकी मदद करने में सक्षम हैं। इसके बदले में सऊदी अरब को इस्राईल को वह देना होगा, जिसकी वह लंबे समय से माँग करता रहा है—यानी सऊदी अरब के साथ संबंधों का सामान्यीकरण और इस्राईल को आधिकारिक मान्यता देने की दिशा में समझौता।

अख़बार के मुताबिक़, यह वही सामान्यीकरण है जिसकी संभावना लगभग तीन साल पहले समाप्त हो गई थी और जिसे नेतन्याहू अब फिर से हासिल करना चाहते हैं।

इस्राईल की पारंपरिक नीति से बड़ा विचलन

‘मआरिव’ का कहना है कि इस मामले में नेतन्याहू इस्राईल की पारंपरिक नीति से काफ़ी दूर जा रहे हैं। अख़बार के अनुसार, इस्राईली सेना का काम देश और उसकी संस्थाओं की रक्षा करना है, न कि “क्षेत्रीय पुलिसकर्मी” बनना या दूसरों के हितों की सेवा करना। अख़बार का तर्क है कि इस तरह की नीतियों से इस्राईल को निराशा के अलावा कुछ हासिल नहीं हुआ है—यहाँ तक कि उसके सऊदी साझेदारों से भी उसे अपेक्षित परिणाम नहीं मिले हैं।

लेख के अंत में अख़बार ने कहा:

“जब दो अरब देश आपस में युद्ध लड़ रहे हों, तो इस्राईल का वहाँ कोई काम नहीं है।” ‘मआरिव’ का मानना है कि नेतन्याहू को इस बार कुछ अलग करने के बजाय लिकुड पार्टी के दो पूर्व नेताओं—यित्ज़ाक शमीर और मेनाखेम बेगिन—की नीतियों से सीख लेनी चाहिए। अख़बार के अनुसार, “इस बार अलग तरीक़े से व्यवहार करने का कोई कारण नहीं है।”

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