इज़रायल के किर्यात शिमोना में युद्धविराम समझौते के खिलाफ विरोध प्रदर्शन
इज़रायल के उत्तरी शहर किर्यात शिमोना में युद्धविराम समझौते के खिलाफ तेज होता विरोध अब हिज़्बुल्लाह और इज़रायली सरकार के बीच शक्ति संतुलन पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। लेबनान के साथ हुए इस युद्धविराम को जहां हिज़्बुल्लाह की एक रणनीतिक सफलता के रूप में देखा जा रहा है, वहीं इज़रायल के अंदर खासकर उत्तरी इलाकों में रहने वाले लोग खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं।
स्थानीय निवासियों का कहना है कि महीनों तक असुरक्षा, रॉकेट हमलों और तनाव झेलने के बाद भी उन्हें कोई ठोस सुरक्षा गारंटी नहीं मिली। इसके उलट, बेंजामिन नेतन्याहू की सरकार पर आरोप लग रहे हैं कि उसने राजनीतिक लाभ के लिए जल्दबाजी में यह समझौता किया, जिससे सीमावर्ती नागरिकों की चिंताओं को नजरअंदाज कर दिया गया।
इज़रायली अखबार Yedioth Ahronoth के पत्रकार Yair Kraus की रिपोर्ट के अनुसार, नगर प्रशासन ने विरोध दर्ज कराने के लिए स्कूलों और कई सार्वजनिक सेवाओं को बंद रखने का फैसला किया है। इसके अलावा बसों का काफिला निकालकर यह संदेश दिया जा रहा है कि सरकार के “जीत के दावे” जमीनी हकीकत से मेल नहीं खाते।
शहर के मेयर Avichai Stern ने खुलकर सरकार की आलोचना करते हुए कहा कि यह युद्धविराम असल में क्षेत्रीय राजनीति, खासकर लेबनान के आगामी चुनावों को ध्यान में रखकर किया गया एक कदम है। उनका कहना है कि जहां बेरूत में इस समझौते को हिज़्बुल्लाह की “मजबूती” के रूप में पेश किया जा रहा है, वहीं इज़रायल के नागरिक खुद को असुरक्षित और उपेक्षित महसूस कर रहे हैं।
कई विश्लेषकों का मानना है कि यह घटनाक्रम इस बात का संकेत है कि क्षेत्रीय स्तर पर हिज़्बुल्लाह का प्रभाव बढ़ा है और उसने इज़रायल को ऐसी स्थिति में ला दिया है, जहां उसे सैन्य दबाव के बावजूद समझौता करना पड़ा। इससे बेंजामिन नेतन्याहू की नीतियों और नेतृत्व क्षमता पर भी सवाल उठ रहे हैं, खासकर उन नागरिकों के बीच जो सीधे इस संघर्ष से प्रभावित हुए हैं।

