फ़िलिस्तीन-इज़रायल विवाद और अरब शासकों की चुप्पी
फ़िलिस्तीन के ग़ाज़ा शहर में इज़रायल ने अमेरिका के समर्थन से ग़ाज़ा में नरसंहार का दूसरा दौर शुरू कर दिया है। उसके इस वहशियाना हमले मे हर रोज़ सैकड़ो निर्दोष नागरिक शहीद हो रहे हैं, जिसमें सबसे ज़्यादा संख्या मासूम बच्चों और महिलाओं की है। इज़रायल पूरी निर्लंज्जता से अपने इस वहशियाना हमले को अंजाम दे रहा है, क्योंकि उसे यक़ीन है कि, उसकी इस बर्बरता को रोकने के लिए कोई सामने नहीं आएगा।
संयुक्त राष्ट्र भी ग़ाज़ा में उसके अत्याचार को रोकने का साहस नहीं कर पा रहा है, जबकि अरब शासक अपनी पगड़ियां इज़रायल के पैरों में रखकर अपने महलों में आराम फ़रमा रहे हैं। उन्हें इस बात पर सुकून है कि, उनकी बादशाहत बची हुई है। स्वतंत्र फ़िलिस्तीन की तरह कोई यहां लोकतंत्र की बात नहीं कर रहा है। और अगर किसी ने यहां लोकतंत्र की बात की तो अरबों की सोई हुई ग़ैरत जाग जाएगी और बहरैन की तरह यहां पर भी उन आवाज़ों को कुचल दिया जाएगा।
अरब नेता ग़ाज़ा निवासियों की मदद क्यों नहीं करते??
अब यहां पर दिमामा में एक प्रश्न करवटें लेने लगता है कि, अरब नेता ग़ाज़ा निवासियों की मदद क्यों नहीं करते? जबकि कि दुनिया देख रही है कि, कई शक्तिशाली देेशों की सरकारें ग़ाज़ा में इज़रायली अत्याचार के समर्थन में खड़ी हुई हैं। ग़ाज़ा नरसंहार पर, पूरे यूरोप में आम जनता की नाराज़गी अपने चरम पर पहुंच चुकी हैं। अमेरिका कोलंबिया समेत पूरे यूरोप के छात्र फिलिस्तीन एकजुटता के लिए बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं, और यह कई सत्तारूढ़ अभिजात वर्ग को भयभीत करता है जो फिलिस्तीनी मुद्दे से डरते हैं।
वे इसे खतरनाक रूप से अस्थिर करने वाला मानते हैं, और कुछ महीने पहले मिस्र, जॉर्डन और सऊदी अरब सहित कुछ अरब राज्यों ने अपने देशों में फिलिस्तीन समर्थक सक्रियता पर अंकुश लगाना शुरू कर दिया था। इन अरब देशों में इस तरह की कार्रवाई कोई आश्चर्य की बात नहीं है और इसे दो स्तरों पर समझा जाना चाहिए। पहला इन देशों में बुनियादी स्तर पर विरोध प्रदर्शनों पर लागू होता है। दूसरा फ़िलिस्तीनी मुद्दे के लिए विशिष्ट है।
आम तौर पर सत्तावादी शासन अक्सर वैधता संकट से ग्रस्त होते हैं और इसलिए वे किसी भी जमीनी स्तर की सक्रियता और नागरिकों की लामबंदी को संभावित रूप से ख़तरा मानते हैं। यह मामला इस बात से अलग है कि लोग किस कारण से एक साथ आते हैं। अधिकांश अरब सरकारें ऐसे आंदोलनों को सहयोजित और विनियमित करना चाहती हैं और उन्हें शासन समर्थित आख्यानों और हितों को कभी भी चुनौती देने से रोकना चाहती हैं।
कोलंबिया विश्वविद्यालय में मध्य पूर्व, दक्षिण एशियाई और अफ्रीकी अध्ययन विभाग की शोध फेलो मरीना कैलकुली ने आरएस को दिए साक्षात्कार में कहा, “अधिकांश अरब देशों को आम तौर पर लोकप्रिय विरोधों से एलर्जी है।” “उन्हें डर है कि सार्वजनिक क्षेत्र को खोलने और फिलिस्तीनियों के प्रति एकजुटता के विरोध की अनुमति देने से सरकार और अन्य क्षेत्रों में उनकी नीतियों के खिलाफ विरोध को बढ़ावा मिल सकता है।”
अन्य विशेषज्ञ भी इस बात से सहमत हैं। जॉर्जटाउन यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ फॉरेन सर्विस में प्रिंस अलवालीद सेंटर फॉर क्रिश्चियन-मुस्लिम अंडरस्टैंडिंग के निदेशक नादिर हाशमी ने आरएस को बताया, “किसी भी तरह की लोकप्रिय लामबंदी या सक्रियता जो लोगों को एक साथ लाती है, चाहे वह ऑनलाइन हो या सड़कों पर, इन सत्तावादी शासनों के लिए खतरा है।” उन्होंने कहा, “आज अरब देश फिलिस्तीनी राष्ट्रवाद को पसंद नहीं करते हैं क्योंकि फिलिस्तीनी राष्ट्रवाद अरब की सड़कों पर लोकप्रिय लामबंदी का एक स्रोत है।”
अमेरिकी विश्वविद्यालय बेरूत में प्रतिष्ठित सार्वजनिक नीति फेलो रामी जी खोरी ने आरएस के साथ एक साक्षात्कार में बताया, “अरब शााकों ने अपने नागरिकों को मूल रूप से उपभोक्ताओं में बदल दिया है।”
उन्होंने कहा, “आप जो चाहें खा सकते हैं। अधिकांश अरब राजधानियों में 25 अलग-अलग प्रकार के फ्राइड चिकन मिलते हैं और यह ठीक है। सरकारें यही चाहती हैं कि लोग अपना समय, पैसा और विचार उपभोग पर खर्च करें। लेकिन राजनीतिक शक्ति, सार्वजनिक नीति और आर्थिक लाभ के आवंटन से जुड़ी हर चीज को सरकार द्वारा नियंत्रित किया जाना चाहिए।”
फ़िलिस्तीनी मुद्दा अरब शासकों की कमजोरियों को उजागर करता है
जहाँ तक फिलिस्तीन का प्रश्न है, यह कई अरब सरकारों की कमज़ोरियों को उजागर करता है। जहां एक तरफ़ अरब शासकों को फ़िलिस्तीनी मुद्दे के समर्थन में ज़्यादातर प्रतीकात्मक और सांकेतिक इशारे करके जनता की राय को ध्यान में रखना चाहिए तो दूसरी ओर, कोई भी अरब राज्य इज़रायल का सामना नहीं करना चाहता।
ग़ाज़ा युद्ध के जारी रहने के साथ ही इन शासनों पर घरेलू दबाव बढ़ता जा रहा है, यही मुख्य कारण है कि ये सरकारें ग़ाज़ा में केेवल युद्ध विराम की बातें करके चुप हो जाती हैं। यह फिलिस्तीनियों की भलाई के बारे में इतना नहीं है, जितना कि अरब शासनों की स्थिरता, वैधता और यहां तक कि अस्तित्व को बनाए रखने के बारे में है।
लेबनानी पत्रकार ग़दा ओवेइस ने आरएस से कहा, “फिलिस्तीन एक न्यायोचित मुद्दा है, फिर भी अरब तानाशाहों ने इसे कभी एक ही नज़रिए से नहीं देखा। अब हम लोग अपने शासन की रक्षा कैसे कर सकते हैं?”
यह युद्ध जितना लंबा चलेगा, अरब नागरिकों द्वारा यह स्पष्ट प्रश्न पूछे जाने की संख्या बढ़ती जाएगी कि अरब देश, जो हथियारों पर भारी मात्रा में धन खर्च करते हैं, फिलिस्तीनी प्रतिरोध को एक गोली भी क्यों नहीं दे रहे हैं??
ऐसे सवाल इन शासकों को बेहद असहज बनाते हैं, खासकर उन अरब राज्यों को जिन्होंने तेल अवीव के साथ राजनयिक संबंध सामान्य कर लिए हैं। ऐसे मौके पर, जब यूरोपीय देशों की जनता और छात्र प्रतिक्रिया दे रहे हैं और इज़रायल के इन हमलों को ग़ाज़ा में नरसंहार मानते हैं, अरब सरकारों की ओर से शर्म की भावना है, जिन्होंने पश्चिम देशों और इजरायल के साथ मिलकर फिलिस्तीनी मुद्दे को सामान्यीकरण समझौतों के तहत दफनाने की कोशिश की है।
फ़िलिस्तीन की ज़मीन पर इज़रायल बसा कैसे?
फ़िलिस्तीन में 1947 के पहले मुसलमान, ईसाई और यहूदी मिल जुलकर रहते थे और वह एक धर्मनिरपेक्ष जगह थी जहाँ सभी धर्म के मानने वाले अपने अपने तरीक़े से इबादत किया करते थे। अक़्सा कंपाउंड में तीनो मज़हबों के चिन्ह मौजूद है जहाँ यहूदी, मुसलमान और ईसाई इबादत करते थे। लेकिन अचानक क्या हुआ की मामला गड़बड़ हो गया?
बात कुछ ऐसे लोगो की है जिन्हें धर्म के नाम पर अपना एक मुल्क चाहिए था, वह लोग सियासी यहूदी जो अपने आप को *ज़ायोनिस्ट* कहलाते है और उनका मानना है की दुनिया में यहूदियों का एक मुल्क होना चाहिए जो किसी भी ख़तरे से अम्न में रहे और उसके दुश्मन को दुनिया से मिटा दिया जाए।
इस प्लान के साथ *ज़ायोनिस्ट* यहूदी 1898 में स्विट्ज़रलैंड के बेसेल शहर में मिले और अपने लिए एक ऐसी जगह चुनी जो इतिहास के हिसाब से उनका जन्म स्थल था. उन्होंने इसे *प्रॉमिस्ड लैंड* का नाम दिया और सारी दुनिया में जहां जहां भी यहूदी थे उन्हें वहां आने के लिए प्रोत्साहित किया।
अपने इस प्लान को पूरा करने के लिए ज़ायोनिस्ट लोगो ने विश्व युद्ध प्रथम के पहले अंग्रेज़ों के साथ भी एक मुहाएदा (अग्रिमेंट) किया कि फ़िलिस्तीन की ज़मीन अगर उन्हें दी जाती है तो आने वाली सभी जंगों में वह उनका साथ देंगे।
प्रथम विश्व युद्ध में अंग्रेज़ों की जीत हुई जिसके बाद अंग्रेज़ों ने उस्मानिया हुकूमत को तोड़कर उस देश को 18 मुल्कों में बांट दिया. फ़िलिस्तीन के हिस्से को अपने कंट्रोल में रखा. 1920 के बाद से सारी दुनिया के यहूदी फ़िलिस्तीन की ज़मीन पर आने लगे जिन्हें अंग्रेज़ों ने बहुतसी सहूलियत दी और फ़िलिस्तीनी मुसलमानों ने उन्हें जगह भी दी।
दूसरे विश्व युद्ध के बाद जब अंग्रेज़ फ़िलिस्तीन छोड़ रहे थे तब यहूदियों ने UN में अपनी अर्ज़ी दी कि फ़िलिस्तीन की ज़मीन को दो हिस्सों में बांटा जाए और वहां पर उन्हें अपना मुल्क बनाने दिया जाए, जिसे UN ने एक ही दिन में पारित कर के 18 मई 1948 में *इस्राईल* नाम के मुल्क का एलान कर दिया।
फिर क्या था, इज़रायल अपने पंजे पसारने लगा और अंग्रेज़ों, अमेरिकी और फ्रांस की सेना की मदद से अरब मुल्कों को हरा कर पूरी फ़िलिस्तीनी ज़मीन अपने चंगुल में कर ली। तब से लेकर आज तक इज़रायल रोज़ फ़िलिस्तीनियों पर हमला करता है और उन्हें छोटी सी ग़ज्ज़ा पट्टी और वेस्ट बैंक में क़ैद कर रखा है।अपनी आज़ादी की आवाज़ उठाने वालों को आतंकवादी बुलाया जाता है और क़ब्ज़ा करने वाले आतंकी इज़रायल को शांति का दूत।