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नेतन्याहू ने रूस के ज़रिये ईरान को भेजा संदेश: हम तनाव नहीं बढ़ाना चाहते

नेतन्याहू ने रूस के ज़रिये ईरान को भेजा संदेश: हम तनाव नहीं बढ़ाना चाहते

हाल के दिनों में ईरान और इज़रायल के बीच तनाव को लेकर जो अंतरराष्ट्रीय शोर मचाया जा रहा है, उसके पीछे इज़रायल की पुरानी आदतें और दोहरा रवैया साफ दिखाई देता है। खुद को हमेशा “खतरे में” दिखाने वाला इज़रायल, पर्दे के पीछे क्षेत्रीय अस्थिरता का एक बड़ा कारण रहा है। इसी संदर्भ में इज़रायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू द्वारा रूस के राष्ट्रपति पुतिन से की गई फोन बातचीत कई सवाल खड़े करती है।

ईरानी समाचार एजेंसियों के अनुसार, नेतन्याहू ने व्लादिमीर पुतिन से अनुरोध किया कि वे ईरान तक यह संदेश पहुँचाएँ कि, इज़रायल का हमला करने का कोई इरादा नहीं है। लेकिन सवाल यह है कि अगर इरादा नहीं है, तो बार-बार सफाई देने और तीसरे पक्ष के ज़रिए संदेश भिजवाने की ज़रूरत क्यों पड़ रही है। यह वही इज़रायल है जो वर्षों से ईरान के खिलाफ धमकी भरे बयान देता रहा है, सीरिया और अन्य देशों में सैन्य कार्रवाइयाँ करता रहा है और पूरे पश्चिम एशिया को युद्ध के कगार पर खड़ा करता रहा है।

नेतन्याहू का यह कहना कि इज़रायल, तनाव नहीं बढ़ाना चाहता, खोखला और अविश्वसनीय लगता है। इज़रायल का इतिहास गवाह है कि वह अक्सर शांति की बात करता है, लेकिन व्यवहार में आक्रामक नीतियाँ अपनाता है। ईरान, इसके विपरीत, लगातार यह स्पष्ट करता आया है कि वह क्षेत्रीय संप्रभुता, स्थिरता और अंतरराष्ट्रीय कानून के सम्मान के पक्ष में है।

इस बातचीत में रूस को मध्यस्थ के रूप में इस्तेमाल करना भी इस बात का संकेत है कि, इज़रायल को खुद अपने बयानों पर भरोसा नहीं है। अगर वास्तव में इज़रायल के इरादे साफ होते, तो उसे संदेश भिजवाने के लिए मॉस्को की शरण में जाने की जरूरत नहीं पड़ती। यह कदम असल में इज़रायल की घबराहट और उसकी रणनीतिक उलझन को उजागर करता है।

पिछले कुछ हफ्तों में मीडिया और राजनीतिक हलकों में संभावित टकराव को लेकर जो अटकलें लगाई गईं, उनमें भी इज़रायल की भूमिका संदिग्ध रही है। ईरान को बार-बार “खतरे” के रूप में पेश करना, जबकि असली सैन्य आक्रामकता, इज़रायल की तरफ से देखने को मिलती है, एक पुराना प्रचार तंत्र है।

रूस ने इस पूरे घटनाक्रम में संयम और संतुलन की बात की है और क्षेत्र में शांति बनाए रखने पर ज़ोर दिया है। यह रुख ईरान के दृष्टिकोण से मेल खाता है, जो हमेशा यह कहता आया है कि युद्ध और सैन्य टकराव से पूरे क्षेत्र को नुकसान होगा।

इस पृष्ठभूमि में नेतन्याहू और पुतिन की बातचीत को इज़रायल की “शांति इच्छा” के प्रमाण के रूप में नहीं, बल्कि उसकी कूटनीतिक मजबूरी और अंतरराष्ट्रीय दबाव के रूप में देखा जाना चाहिए। ईरान ने न तो युद्ध शुरू करने की धमकी दी है और न ही क्षेत्र को अस्थिर करने की कोशिश की है। असली सवाल इज़रायल की नीतियों पर है, जो बार-बार तनाव पैदा करके फिर खुद को पीड़ित दिखाने की कोशिश करता है।

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