मैक्रों की दोहरी नीति बेनकाब: हिज़्बुल्लाह पर दबाव, इज़रायल पर नरमी
फ़्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने आज कहा: “मैं कल अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा घोषित हिज़्बुल्लाह और इज़रायल के बीच युद्धविराम का पूरी तरह समर्थन करता हूँ।”
मैक्रों ने अपने आधिकारिक सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म ‘एक्स’ (पूर्व ट्विटर) पर लिखा: “मैं [इज़रायल] की सैन्य कार्रवाइयों के जारी रहने से युद्ध-विराम के कमजोर पड़ने की संभावना पर भी अपनी चिंता व्यक्त करता हूँ।”
उन्होंने उत्तरी कब्ज़ाए गए फ़िलिस्तीन की बस्तियों में बसे इज़रायली लोगों की सुरक्षा को लेकर चिंता जताते हुए दावा किया: “हिज़्बुल्लाह को अपने हथियार छोड़ देने चाहिए।”
मैक्रों का हालिया बयान एक बार फिर पश्चिमी देशों की दोहरी नीति को उजागर करता है। जहां एक ओर वे हिज़्बुल्लाह से हथियार डालने की मांग कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर इज़रायल की लगातार जारी सैन्य कार्रवाइयों पर केवल “चिंता” जताकर औपचारिकता निभा रहे हैं।
यह सवाल उठता है कि जब लेबनान की धरती पर बार-बार हमले हो रहे हैं, नागरिकों की जान जा रही है और संप्रभुता का उल्लंघन हो रहा है, तब हिज़्बुल्लाह जैसे प्रतिरोधी संगठन से आत्मसमर्पण की मांग किस आधार पर की जा रही है?
हिज़्बुल्लाह को लेबनान में एक प्रतिरोध की ताक़त के रूप में देखा जाता है, जिसने बाहरी आक्रमणों के खिलाफ देश की रक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
मैक्रों का यह बयान ऐसे समय में आया है जब क्षेत्र में तनाव चरम पर है और इज़रायल की ओर से सैन्य दबाव लगातार जारी है। ऐसे में केवल हिज़्बुल्लाह को निशाना बनाना न सिर्फ पक्षपातपूर्ण है बल्कि यह ज़मीनी हकीकतों से भी आंख मूंदने जैसा है।
आलोचकों का मानना है कि यदि वास्तव में स्थायी शांति की इच्छा है, तो सबसे पहले इज़रायल को आक्रामक कार्रवाई रोकनी होगी और अंतरराष्ट्रीय कानूनों का पालन करना होगा। केवल प्रतिरोधी ताकतों को कमजोर करने की कोशिश करना, शांति नहीं बल्कि असंतुलन को और बढ़ावा देगा।
इस संदर्भ में मैक्रों का बयान एकतरफा और वास्तविकता से दूर प्रतीत होता है, जो क्षेत्र में न्यायपूर्ण समाधान के बजाय राजनीतिक दबाव की रणनीति को दर्शाता है।

