जूलानी की लेबनान को नसीहत: इज़रायल से बातचीत में सीरिया की ग़लती न दोहराएं
लेबनानी अख़बार अल-अख़बार ने लिखा है कि सीरिया के स्वयंभू राष्ट्रपति Ahmed al-Sharaa (जूलानी) ने हाल ही में लेबनान के प्रधानमंत्री से मुलाक़ात के दौरान चेतावनी दी कि इज़रायल के साथ बातचीत में वह “सीरिया की गलती” न दोहराएं, यानी बिना किसी गारंटी और पारस्परिक लाभ के रियायतें न दें।
जूलानी के अनुसार, इज़रायल दूसरे पक्ष को धीरे-धीरे रियायतें देने की ओर धकेलता है, जबकि बदले में कोई ठोस गारंटी नहीं देता।
उन्होंने यह भी कहा कि इज़रायल जानबूझकर कुछ मुद्दों को अनसुलझा छोड़ देता है, ताकि भविष्य में अपने राजनीतिक और सैन्य हस्तक्षेप के दायरे को और बढ़ाने का बहाना उसके पास बना रहे।
जूलानी का यह बयान ऐसे समय में आया है जब स्वयं उनकी राजनीतिक वैधता और क्षेत्रीय नीतियों पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। आलोचकों का कहना है कि जिस व्यक्ति का अतीत सशस्त्र समूहों और संघर्षों से जुड़ा रहा हो, उसकी ओर से कूटनीतिक नसीहतें देना अपने आप में विरोधाभासी प्रतीत होता है।
दूसरी ओर, लेबनान सरकार भी आलोचना का सामना कर रही है। विरोधी धड़ों का आरोप है कि देश की आर्थिक और राजनीतिक समस्याओं के बीच सरकार विदेशी दबावों के सामने पर्याप्त दृढ़ता नहीं दिखा पा रही है और राष्ट्रीय हितों की रक्षा में कमजोर साबित हुई है।
बता दें कि इज़रायल पर हमेशा यह आरोप लगाया जाता रहा है कि वह वार्ताओं के दौरान अपनी सैन्य और राजनीतिक बढ़त का उपयोग करता है तथा कई विवादित मुद्दों को जानबूझकर अधूरा छोड़ देता है, ताकि भविष्य में हस्तक्षेप और दबाव बनाने के लिए उन्हें बहाने के रूप में इस्तेमाल किया जा सके।
इस घटनाक्रम ने एक बार फिर यह बहस छेड़ दी है कि क्या क्षेत्र के देशों की सरकारें वास्तव में अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता दे रही हैं, या फिर बाहरी शक्तियों और राजनीतिक समीकरणों के दबाव में निर्णय ले रही हैं।

