ईरान पर प्रतिबंधों की वापसी पर इज़रायल की प्रतिक्रिया
संयुक्त राष्ट्र द्वारा ईरान पर लगाए गए प्रतिबंधों की वापसी पर इज़रायल की प्रतिक्रिया सामने आई है। इज़रायली विदेश मंत्रालय ने इस कदम को “एक महत्वपूर्ण विकास” बताया और अंतरराष्ट्रीय समुदाय से ईरान के परमाणु कार्यक्रम को रोकने के लिए सभी साधनों का इस्तेमाल करने की अपील की। लेकिन विडंबना यह है कि इज़रायल स्वयं दशकों से परमाणु हथियारों के जखीरे का मालिक है और कभी भी अंतरराष्ट्रीय जांच या निगरानी को स्वीकार नहीं किया है। सवाल यह है कि जिसे खुद परमाणु हथियार रखने का कोई अधिकार नहीं दिया गया, वह दूसरे देशों पर किस नैतिकता से आरोप लगा रहा है?
27 सितंबर को फ्रांस, ब्रिटेन और जर्मनी ने, अमेरिका के एकतरफा तौर पर परमाणु समझौते (JCPOA) से बाहर निकलने के बावजूद, ईरान को दोषी ठहराकर “स्नैप-बैक” मैकेनिज्म सक्रिय किया। इसके तहत संयुक्त राष्ट्र के प्रतिबंध दोबारा लागू कर दिए गए। लेकिन चीन और रूस ने इसे साफ़ तौर पर अवैध और अस्वीकार्य ठहराते हुए कहा है कि वे इस तरह के प्रतिबंधों को मान्यता नहीं देंगे।
असलियत यह है कि ईरान ने हमेशा JCPOA के तहत अपने वादों को पूरा किया, जबकि समझौते से बाहर निकलने का फ़ैसला अमेरिका ने किया था। इसके बावजूद ईरान को सज़ा देना और इज़रायल का उस पर हावी होने की कोशिश करना, अंतरराष्ट्रीय राजनीति की दोहरी नीति को उजागर करता है।
कई विशेषज्ञ मानते हैं कि संयुक्त राष्ट्र के ये प्रतिबंध ईरान पर कोई विशेष असर नहीं डालेंगे, क्योंकि वाशिंगटन पहले ही ईरान पर बहुत कड़े प्रतिबंध लगा चुका है। हाल के वर्षों में ईरान ने न केवल इन पाबंदियों का सामना किया बल्कि आर्थिक और तकनीकी आत्मनिर्भरता की दिशा में भी महत्वपूर्ण प्रगति की है। यही वजह है कि आज ईरान क्षेत्र में स्वतंत्र और मज़बूत देश के रूप में उभर रहा है, जबकि इज़रायल बार-बार उसका डर दिखाकर दुनिया को गुमराह करने की कोशिश कर रहा है।

