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फ़िलिस्तीन के समर्थन के कारण इस्राईली मीडिया का ओमान के मुफ़्ती पर हमला

फ़िलिस्तीन के समर्थन के कारण इस्राईली मीडिया का ओमान के मुफ़्ती पर हमला

ओमान के मुफ़्ती, शेख अहमद बिन हमद अल-खलीली, ने इस्राईल के संबंध में अपने सार्वजनिक रुख़ और फ़िलिस्तीनी मुद्दे के समर्थन के कारण इस्राईली शासन की ओर से चलाए जा रहे उकसावे वाले अभियान का निशाना बनाया गया है।

फ़ार्स न्यूज़ एजेंसी के अंतरराष्ट्रीय समूह के अनुसार, प्रकाशित किए गए वीडियो में हिब्रू टेलीविजन चैनल 11 के एक पत्रकार ने कहा कि ओमान के मुफ़्ती“इस्राईल पर हमला करने और उसके दुश्मनों के समर्थन की घोषणा करने का कोई अवसर नहीं छोड़ते।” यह टिप्पणी फ़िलिस्तीन के मुद्दे और इस्राईली क़ब्ज़े के संबंध में अल-ख़लीली द्वारा बार-बार व्यक्त किए गए रुख़ की ओर संकेत करती है।

अरबी21 के हवाले से बताया गया है कि ये आलोचनाएँ ऐसे समय में सामने आई हैं, जब ओमान के मुफ़्ती ने पिछले कुछ महीनों के दौरान कई बार फ़िलिस्तीनियों के समर्थन और इस्राईली शासन की आलोचना में अपने विचार व्यक्त किए हैं। उन्होंने फ़िलिस्तीनी मुद्दे से संबंधित विभिन्न गतिविधियों के लिए भी अपना समर्थन जताया है।

पिछले मई में अल-खलीली ने “ग्लोबल सुमूद फ्लोटिला” (Global Sumud Flotilla) में शामिल कुछ ओमानी प्रतिभागियों से मुलाक़ात की। उन्होंने कहा कि, इस समुद्री अभियान के परिणामस्वरूप वैश्विक स्तर पर प्रतिक्रिया देखने को मिली है और इसका महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ा है। उन्होंने ऐसे अभियानों को दोहराने में तेजी लाने का भी आह्वान किया।

जून में भी अल-खलीली ने ग़ाज़ा पट्टी पर लगाए गए घेरे/नाकाबंदी को तोड़ने के उद्देश्य से समुद्री काफ़िलों को जारी रखने और उनकी संख्या बढ़ाने का आह्वान किया। उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि हाल के जन-आंदोलनों और अंतरराष्ट्रीय स्तर की गतिविधियों ने दुनिया की जनमत को प्रभावित करने और उसमें बदलाव लाने की अपनी क्षमता साबित की है।

ओमान के मुफ़्ती ने इससे पहले भी इसी वर्ष इस्राईली शासन की आलोचना में स्पष्ट रुख अपनाया था। मार्च में उन्होंने अल-अक्सा मस्जिद को बंद किए जाने और फ़िलिस्तीनियों के अधिकारों के उल्लंघन की निंदा की थी। साथ ही उन्होंने इन घटनाक्रमों के प्रति इस्लामी देशों की चुप्पी की भी आलोचना की थी।

सितंबर में भी अल-खलीली का यही रुख़ जारी रहा। उन्होंने यमन, फ़िलिस्तीन, लेबनान और ईरान के घटनाक्रमों को लेकर एक बयान जारी किया और अंसारुल्लाह आंदोलन के संबंध में कुछ मुस्लिम विद्वानों के रुख की आलोचना की। उनका कहना था कि ध्यान अब भी इस्राईली शासन का मुक़ाबला करने पर केंद्रित रहना चाहिए।

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