इराक़ अमेरिकी इच्छा के अधीन नहीं रहेगा / ईरान से उड़ानों की बहाली के प्रयास जारी: इमामे जुमा बग़दाद
बग़दाद के इमामे जुमा और नजफ़ के प्रमुख धार्मिक विद्वान आयतुल्लाह सैयद यासीन अल-मूसवी ने कहा:
इराक़ अमेरिका की इच्छा के अधीन नहीं होगा और बग़दाद को उन शक्तियों के साथ अपने सहयोगात्मक संबंधों का विस्तार करना चाहिए, जो इराक़ की शक्ति, प्रभुत्व और गरिमा को मज़बूत करती हैं।
ईरानी समाचार एजेंसी इरना की रिपोर्ट के अनुसार, आयतुल्लाह अल-मूसवी ने इराक़ और उसकी राष्ट्रीय शक्तियों को कमज़ोर किए जाने के प्रति चेतावनी देते हुए कहा कि, इराक़ को उन शक्तियों के साथ सहयोगात्मक संबंध विकसित करने चाहिए, जो देश की शक्ति, प्रभुत्व और गरिमा को मज़बूत करने में योगदान देती हैं। उन्होंने इस्लामी गणराज्य ईरान को एक क्षेत्रीय शक्ति बताया, जिसने अमेरिका और इस्राईल के ख़िलाफ़ प्रतिरोध किया है।
हवाई अड्डों पर प्रतिबंधों की आलोचना और ईरान से उड़ानों की बहाली की मांग
बग़दाद के इमामे जुमा ने ईरान से आने वाली कुछ उड़ानों को इराक़ में प्रवेश से रोकने के फैसले की भी आलोचना की। उन्होंने कहा कि, इन उड़ानों के यात्रियों में एक बड़ी संख्या इमाम हुसैन (अ.) के ज़ायरीन की होती है।
उन्होंने बताया कि उन्होंने इस मामले को इराक़ी और ईरानी अधिकारियों के साथ-साथ संबंधित समिति के समक्ष भी उठाया है। उनके अनुसार, उन्हें इन क़दमों के पीछे संभावित सुरक्षा ख़तरों या अन्य सुरक्षा संबंधी कारणों के बारे में जो जानकारी दी गई, उससे इन दावों की पुष्टि नहीं हुई।
इराक़ी जनता की एकता पर ज़ोर; अमेरिका से सम्मान और गरिमा के साथ संबंध
आयतुल्लाह अल-मूसवी ने इस बात पर ज़ोर दिया कि इराक़ की जनता एकजुट राष्ट्र है। उन्होंने कहा कि इमाम हुसैन (अ.) की ज़ियारत और प्रतिरोध के कमांडरों के अंतिम संस्कार में लोगों की व्यापक भागीदारी इस बात का प्रमाण है कि इराक़ी जनता अपनी गरिमा और सम्मान के प्रति प्रतिबद्ध है और किसी भी प्रकार की अधीनता या आत्मसमर्पण को स्वीकार नहीं करती।
उन्होंने इराक़ के राजनीतिक समूहों, विशेष रूप से ‘कोऑर्डिनेशन फ्रेमवर्क’ (समन्वय ढाँचा)—जो शिया राजनीतिक दलों का गठबंधन है—से इराक़ की गरिमा की रक्षा करने की अपनी ज़िम्मेदारी निभाने का आह्वान किया।
उन्होंने कहा कि अमेरिका के साथ संबंध गरिमा और सम्मान की स्थिति से होने चाहिए, न कि अधीनता और रियायतें देने की स्थिति से। हथियार राज्य के ढाँचे के भीतर होने चाहिए; हथियारों के नियमन को अमेरिकी प्रभाव का माध्यम नहीं बनना चाहिए।
आयतुल्लाह अल-मूसवी ने हथियारों के मुद्दे पर भी बात की और कहा कि उनका स्थायी रुख यह है कि सैन्य शक्ति राज्य की संरचना का हिस्सा होनी चाहिए तथा वे सरकारी संस्थाओं के बाहर सशस्त्र समूहों के गठन के पक्ष में नहीं हैं।
हालाँकि, उन्होंने साथ ही ज़ोर देकर कहा कि हथियारों को व्यवस्थित करने की प्रक्रिया को उन ताक़तों को कमज़ोर करने का बहाना नहीं बनाया जाना चाहिए, जिन्होंने आतंकवाद के खिलाफ़ लड़ाई लड़ी है। न ही इसका इस्तेमाल इराक़ पर अमेरिकी प्रभाव थोपने के लिए किया जाना चाहिए।
लेबनानी प्रतिरोध और यमन के अंसारुल्लाह की प्रशंसा
नजफ़ के धार्मिक विद्वान ने लेबनान के प्रतिरोध और यमन के अंसारुल्लाह की भी प्रशंसा की और इन शक्तियों को अमेरिका तथा इस्राईल के मुकाबले, शक्ति और प्रतिरोधक क्षमता के तत्वों में से बताया।
उन्होंने ईरान के सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह शहीद सैयद अली ख़ामेनेई की भूमिका की भी प्रशंसा की और कहा कि उन्होंने ऐसी क्षेत्रीय शक्ति के निर्माण में भूमिका निभाई, जो अमेरिका को चुनौती देने की क्षमता रखती है।
कुछ अरब और इस्लामी देशों के रुख़ की आलोचना
आयतुल्लाह अल-मूसवी ने संयुक्त राष्ट्र की हालिया बैठकों में कुछ अरब और इस्लामी देशों के रुख़ की आलोचना करते हुए कहा कि जब क्षेत्र की जनता हत्याओं और तबाही का सामना कर रही है, उस समय इन देशों के अधिकारियों द्वारा अमेरिकी अधिकारियों का स्वागत और उनके साथ सहयोग करना इन देशों की गरिमा के अनुरूप नहीं है।
उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति के साथ बैठक में इराक़ के प्रधानमंत्री की भागीदारी की भी आलोचना की और कहा कि, इराक़ को अमेरिका के सामने इस तरह पेश नहीं होना चाहिए कि उसके व्यवहार में अधीनता और अपमान का कोई संकेत दिखाई दे।
संयुक्त राष्ट्र की आलोचना; अमेरिका ने उपनिवेशवाद को नए रूप में दोहराया
बग़दाद के इमामे जुमा ने अपने भाषण के एक अन्य हिस्से में कहा कि संयुक्त राष्ट्र अन्याय के ख़िलाफ़ खड़ा होने या युद्धों और क़ब्ज़ों को रोकने में सक्षम नहीं रहा है, विशेष रूप से सोवियत संघ के विघटन के बाद, जब अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था एकध्रुवीय व्यवस्था की ओर बढ़ी।
उन्होंने कहा कि अमेरिका और उसके पश्चिमी सहयोगी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में प्रभावशाली शक्ति बन गए हैं और वॉशिंगटन ने विभिन्न देशों में हस्तक्षेप करके तथा युद्ध शुरू करके उपनिवेशवाद के तरीकों को एक नए रूप में दोहराया है। बग़दाद के इमामे जुमा ने इन कार्रवाइयों का सामना करने में संयुक्त राष्ट्र की असमर्थता की भी आलोचना की।

