ईरानियों ने समर्पण नहीं, बल्कि जीत का झंडा उठाया: वॉशिंगटन पोस्ट
अमेरिकी अख़बार वॉशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट के अनुसार, जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान की “हज़ारों साल पुरानी सभ्यता को मिटाने” की धमकी दी, तो इसके जवाब में ईरानी जनता डरकर घरों में नहीं छिपी, बल्कि बड़ी संख्या में तेहरान की सड़कों पर उतर आई। यह दृश्य इस बात का संकेत था कि बाहरी दबाव के बावजूद ईरानी समाज झुकने के बजाय डटकर खड़ा है।
रिपोर्ट बताती है कि लोगों के हाथों में सफेद झंडे (समर्पण के प्रतीक) नहीं थे, बल्कि वे अपने राष्ट्रीय ध्वज—हरे, सफेद और लाल रंग के—लहरा रहे थे। यह प्रतीक था कि भारी बमबारी और दबाव के बावजूद ईरान की राजनीतिक व्यवस्था और राष्ट्रीय पहचान कायम है और टूटने वाली नहीं है।
कुछ प्रदर्शनकारियों ने अमेरिकी झंडे को जलाकर यह संदेश दिया कि वे खुद को कमजोर या पराजित नहीं मानते, बल्कि इस टकराव को अपनी दृढ़ता और प्रतिरोध की जीत के रूप में देखते हैं। ईरान के सरकारी मीडिया ने भी इसे “अपमान का जवाब” और राष्ट्रीय आत्मसम्मान की पुनःस्थापना के रूप में प्रस्तुत किया।
विश्लेषकों के अनुसार, इस पूरे संघर्ष में अमेरिका के बड़े-बड़े सैन्य और राजनीतिक लक्ष्य—जैसे शासन परिवर्तन या पूर्ण आत्मसमर्पण—पूरी तरह हासिल नहीं हो सके। इसके विपरीत, ईरान की सत्ता संरचना बरकरार रही और उसने वार्ता की मेज पर अपने प्रस्तावों के आधार पर बातचीत को आगे बढ़ाने की स्थिति बना ली।
युद्ध-विराम का निर्णय भी इस बात का संकेत माना जा रहा है कि अमेरिका को अपने रुख में नरमी लानी पड़ी, जबकि ईरान ने दबाव के बावजूद अपनी शर्तों और रणनीतिक हितों—जैसे क्षेत्रीय प्रभाव और सामरिक नियंत्रण—को पूरी तरह छोड़ा नहीं।
इस तरह, ईरान के अंदर जो सार्वजनिक प्रतिक्रिया देखने को मिली, वह सिर्फ जश्न नहीं बल्कि एक राजनीतिक संदेश भी थी—कि देश बाहरी दबाव, सैन्य हमलों और कड़ी धमकियों के बावजूद झुका नहीं, बल्कि अपनी संप्रभुता और आत्मसम्मान के साथ खड़ा रहा।

