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शिवसेना (शिंदे) में शामिल होकर बच्चू कडू ने ‘ज़िंदा समाधि’ ले ली है: शिवसेना यूबीटी

शिवसेना (शिंदे) में शामिल होकर बच्चू कडू ने ‘ज़िंदा समाधि’ ले ली है: शिवसेना यूबीटी

हाल ही में पूर्व मंत्री बचू कड़ू (Bachchu Kadu) ने अपनी पार्टी ‘प्रहार जनशक्ति पार्टी’ को समाप्त करके शिवसेना (शिंदे गुट) में शामिल होने का फैसला किया है। इस पर शिवसेना (उद्धव गुट) के मुखपत्र सामना (Saamana) में उन पर कड़ी आलोचना की गई है। संजय राउत द्वारा लिखे गए एक लेख में कहा गया कि “बच्चू कडू ने शिंदे गुट में शामिल होकर ज़िंदा समाधि ले ली है।” इस पर प्रतिक्रिया देते हुए बच्चू कडू ने कहा, “मैं आलोचनाओं की परवाह नहीं करता।”

अख़बार ने लिखा कि “अमरावती से कई बार विधायक रह चुके बच्चू कडू ने ‘मंदे (लाचार) समूह’ में शामिल होकर अपनी राजनीतिक ज़िंदगी की ज़िंदा समाधि ले ली है। उनके राजनीतिक सफर को आगे बढ़ाने के लिए उन्हें विधान परिषद की सदस्यता भी दी गई है, इसलिए अब उन्हें इस समाधि में भी ‘देव’ (भगवान) दिखाई देने लगे हैं।”

‘सामना’ ने आगे लिखा कि “विधानसभा चुनाव हारने के बाद बच्चू कडू मछली की तरह तड़प रहे थे, लेकिन उनकी यह बेचैनी समाज के लिए ठीक नहीं है। उन्होंने किसानों के लिए आंदोलन किया, दिव्यांगों के लिए आवाज़ उठाई। उद्धव ठाकरे (Uddhav Thackeray) के शासनकाल में वे मंत्री भी थे। लेकिन जब शिंदे गुट अलग हुआ, तब यह ‘सेवक’ कार्यकर्ता सूरत, गुवाहाटी और गोवा की यात्राएं करके लौटा और सत्ता के दरबारों में भटकता रहा कि शायद उसे मंत्री पद मिल जाए, मगर ऐसा नहीं हुआ। आखिरकार उसने सरकार के खिलाफ बोलना शुरू कर दिया।”

लेख में आगे कहा गया कि “बच्चू कडू का असली चेहरा सामने आ चुका था और जनता उन्हें पहचान चुकी थी, इसलिए विधानसभा चुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा। जनता ने उनसे उनकी विधायक की कुर्सी छीन ली। तभी से वे बेचैन थे। अब वे कह रहे हैं कि वे सदस्यता के लिए शिंदे गुट में नहीं गए, बल्कि किसानों और दिव्यांगों के अधिकारों की लड़ाई लड़ने के लिए गए हैं, लेकिन यह सब सिर्फ नौटंकी है।”

इसका जवाब देते हुए नागपुर में पत्रकारों से बातचीत में बच्चू कडू ने कहा,

“संजय राउत कहते हैं कि, मैं शिवसेना में इसलिए शामिल हुआ क्योंकि मुझमें जीतने की क्षमता नहीं थी। शायद यह सही भी हो, क्योंकि राजनीतिक हालात बदल चुके हैं। आज राजनीति जाति और धर्म के नाम पर चल रही है, मतदाता पैसे की ओर झुक रहा है। जब लोकतंत्र को बचाने वाले लोग ही नहीं हैं, तो लोकतंत्र ज़िंदा कैसे रहेगा?”

उन्होंने आगे कहा,

“मैंने शिवसेना में शामिल होने का फैसला मजबूरी में नहीं, बल्कि बदलते राजनीतिक हालात को देखते हुए किया है। शिवसेना में टूट के बाद जो लोग गुवाहाटी गए थे, वे सब चुनाव जीत गए और मैं अकेला हार गया। मैं मानता हूं कि, मुझसे गलतियां हुई हैं, लेकिन वे इतनी बड़ी नहीं थीं। मैंने यह फैसला इसलिए लिया है ताकि मेरे कार्यकर्ता राजनीतिक रूप से ज़िंदा रह सकें।”

पूर्व मंत्री ने यह भी कहा,

“बच्चू कडू थककर बैठ जाने वालों में से नहीं है। मैं किसानों और दिव्यांगों के लिए आवाज़ उठाता रहूंगा और उनके लिए काम करता रहूंगा।”

अपनी पार्टी के भीतर उठ रहे विरोध पर उन्होंने कहा,

“जो लोग किसानों के लिए लड़ना चाहते हैं, वे मेरा साथ देंगे। जिनके पेट में दर्द है, वे धोखा देंगे।”

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