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दो साल बाद ग़ाज़ा में बिना दीवार और छत वाले स्कूल फिर खुले

दो साल बाद ग़ाज़ा में बिना दीवार और छत वाले स्कूल फिर खुले

ग़ाज़ा पट्टी में दो साल से चल रहे युद्ध ने ज़्यादातर स्कूलों और कॉलेजों को मिट्टी का ढेर बना दिया था। पढ़ाई बिल्कुल बंद हो गई थी। अब धीरे-धीरे वहाँ पढ़ाई फिर शुरू हो रही है, लेकिन ऐसे स्कूलों में जिनकी दीवारें, दरवाजे और खिड़कियाँ तक नहीं बचीं।

फिलिस्तीनी शिक्षा मंत्रालय के अनुसार, इस युद्ध में ग़ाज़ा के 18,346 से ज़्यादा बच्चे मारे गए और 27,884 घायल हुए। पश्चिमी तट में भी कई बच्चे मारे और घायल हुए। सैकड़ों बच्चों को पकड़कर ले जाया गया। लगभग एक हजार शिक्षक मारे गए और हज़ारों घायल हुए। ग़ाज़ा के 85 प्रतिशत स्कूल या तो टूट चुके हैं या बहुत बुरी तरह खराब हैं। कई विश्वविद्यालय भवन भी नष्ट हो गए हैं। इस वजह से वहाँ एक पूरी पीढ़ी के पढ़ाई से दूर हो जाने का ख़तरा पैदा हो गया था।

तंबुओं और मस्जिदों में कक्षाएँ
इतनी मुश्किल हालत के बीच लोगों ने पढ़ाई शुरू करने की कोशिशें शुरू कर दीं। जिन स्कूलों को कम नुकसान हुआ है, उनकी मरम्मत की जा रही है। जहाँ कुछ भी नहीं बचा, वहाँ खुले मैदानों में तंबू लगाकर कक्षाएँ चल रही हैं। कुछ पुराने ऐतिहासिक भवनों को भी अस्थायी स्कूल में बदल दिया गया है। कई स्कूलों में मेज-कुर्सी, दरवाजा, खिड़की कुछ भी नहीं है। कुछ जगहों पर इज़रायली सेना के कारण स्कूल तक पहुँचना भी बहुत खतरनाक है।

पूर्वी ग़ाज़ा: सबसे बुरी हालत
पूर्वी ग़ाज़ा में तो 90 प्रतिशत स्कूल पूरी तरह टूट चुके हैं। यूनिसेफ जैसे संगठनों की मदद से तंबू-कक्षाएँ लगाई गई हैं और मस्जिदों व क्लबों के मैदानों में भी पढ़ाई कराई जा रही है। लेकिन सारी कोशिशों के बाद भी वहाँ सिर्फ 10 प्रतिशत बच्चे ही स्कूल लौट पाए हैं।

टूटी दीवारों के बीच पढ़ाई
मग़ाज़ी कैंप में एक स्कूल के प्रबंधक बताते हैं कि उन्होंने युद्ध के समय भी अंतिम साल के बच्चों की पढ़ाई नहीं रोकी। अब बिजली नहीं है, दरवाजे-खिड़कियाँ नहीं हैं, दीवारें टूटी हैं, फिर भी रोज तीन घंटे की कक्षा होती है। दो हजार बच्चे ऐसे ही ख़राब हालात में पढ़ने आ रहे हैं क्योंकि उम्मीद अभी बाकी है।

तंबू से बना नया स्कूल
अल-बुरैज कैंप में एक खाली जमीन पर तंबू लगाकर नया स्कूल बनाया गया है। यह स्कूल सुबह और शाम दो शिफ्टों में 2,400 लड़कियों को पढ़ा रहा है। मेज-कुर्सियों की कमी, किताबों का न होना, सामान के दाम बढ़ना और परिवारों की मानसिक थकान जैसी बड़ी परेशानियाँ हैं। फिर भी लोग मानते हैं कि यह स्कूल उन बच्चों के लिए उम्मीद की किरण है जिन्होंने दो साल अंधेरे और डर में बिताए हैं।

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