8 इस्लामी देशों ने वेस्ट बैंक पर इज़रायल के फैसले की निंदा की
आठ अरब और इस्लामी देशों के विदेश मंत्रियों ने एक संयुक्त बयान जारी कर इज़रायल के उस निर्णय की कड़ी निंदा की है, जिसमें वेस्ट बैंक के कुछ हिस्सों को “राज्य भूमि” घोषित करने और फ़िलिस्तीनी जमीनों के स्वामित्व के व्यापक पंजीकरण और निर्धारण की प्रक्रिया शुरू करने की बात कही गई है।
सऊदी अरब, जॉर्डन, संयुक्त अरब अमीरात, क़तर, इंडोनेशिया, पाकिस्तान, मिस्र और तुर्की के विदेश मंत्रियों ने मंगलवार को जारी संयुक्त बयान में वेस्ट बैंक की कब्ज़ाई गई भूमि को लेकर तेल अवीव के हालिया फैसले की कड़ी आलोचना की।
इस निर्णय के तहत इज़रायल ने वेस्ट बैंक की कुछ जमीनों को “राज्य भूमि” के रूप में वर्गीकृत किया है और 1967 के बाद पहली बार बड़े पैमाने पर भूमि के पंजीकरण और स्वामित्व निर्धारण की प्रक्रिया शुरू की है। आलोचकों का कहना है कि यह कदम जमीनों की जब्ती और यहूदी बस्तियों के विस्तार का रास्ता और आसान कर सकता है।
संयुक्त बयान में कहा गया है कि यह कार्रवाई “अंतरराष्ट्रीय कानून और अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून का स्पष्ट उल्लंघन” है और विशेष रूप से चौथे जिनेवा कन्वेंशन के प्रावधानों के विपरीत है, जो सैन्य कब्जे की स्थिति में नागरिकों की सुरक्षा पर जोर देता है। बयान में 2016 में पारित संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव 2334 का भी उल्लेख किया गया, जिसमें क़ब्ज़ाए गए फ़िलिस्तीनी क्षेत्रों में इज़रायली बस्तियों को अवैध क़रार दिया गया था।
विदेश मंत्रियों ने यह भी कहा कि, इज़रायल का यह कदम अंतरराष्ट्रीय न्यायालय की सलाहकार राय के भी विरुद्ध है। न्यायालय ने फ़िलिस्तीनी कब्ज़ाए गए क्षेत्रों में इज़रायल की नीतियों और कार्रवाइयों के कानूनी परिणामों की समीक्षा करते हुए इन क्षेत्रों की कानूनी, ऐतिहासिक और जनसांख्यिकीय स्थिति में बदलाव को अवैध बताया था और कब्ज़े को समाप्त करने तथा बल प्रयोग के माध्यम से भूमि अधिग्रहण को रोकने पर जोर दिया था।
बयान में आगे कहा गया है कि यह कार्रवाई “कानूनी और प्रशासनिक स्तर पर नई वास्तविकता थोपने की कोशिश” है, जो इज़रायल के नियंत्रण को स्थायी बनाने और स्वतंत्र फ़िलिस्तीनी राज्य की संभावनाओं को कमजोर करने की दिशा में उठाया गया कदम है। इन देशों के विदेश मंत्रियों ने इस फैसले के क्षेत्रीय परिणामों को लेकर भी चेतावनी दी और कहा कि ऐसे कदम फ़िलिस्तीनी क्षेत्रों तथा पूरे क्षेत्र में तनाव और अस्थिरता को बढ़ा सकते हैं।
अंत में उन्होंने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से अपील की कि वह कथित “लगातार उल्लंघनों” को रोकने के लिए स्पष्ट और ठोस कदम उठाए और अंतरराष्ट्रीय कानून तथा फ़िलिस्तीनी जनता के “अविच्छिन्न अधिकारों” — जिनमें आत्मनिर्णय का अधिकार, कब्ज़े का अंत और 4 जून 1967 की सीमाओं के आधार पर पूर्वी यरुशलम को राजधानी बनाकर स्वतंत्र फ़िलिस्तीनी राज्य की स्थापना शामिल है — का सम्मान सुनिश्चित करे।

