मिस्र ने लेबनान सरकार को सलाह दी है कि वह हिज़्बुल्लाह के साथ किसी भी तरह के सीधे टकराव से बचे। मिस्र का मानना है कि लेबनान और इस्राईल के बीच हुआ प्रारंभिक समझौता अभी भी बहुत नाज़ुक स्थिति में है।
मिस्र के जानकार सूत्रों ने कहा कि अमेरिका, लेबनान और इस्राईल के संबंधों को सामान्य बनाने की कोशिश कर रहा है, लेकिन लेबनान के भीतर इस मुद्दे पर राष्ट्रीय सहमति नहीं है।
सूत्रों के अनुसार, हाल के दिनों में मिस्र, खाड़ी देशों, तुर्की और यूरोपीय देशों के अधिकारियों के बीच बातचीत हुई, जिसमें युद्धविराम को जारी रखने की कोई ठोस गारंटी न होने पर चिंता व्यक्त की गई।
कुछ देशों का मानना है कि हिज़्बुल्लाह को मौजूदा हालात में अधिक कूटनीतिक तरीके से काम करना चाहिए, ताकि उस पर तनाव बढ़ाने का आरोप न लगाया जा सके और कोई पक्ष इसे आगे की कार्रवाई का बहाना न बना सके।
मिस्र ने अमेरिका से यह भी मांग की है कि लेबनान और इस्राईल की सीमा पर निगरानी के लिए एक स्पष्ट व्यवस्था बनाई जाए। उसका उद्देश्य इस्राईली सेना की वापसी, लेबनानी सेना की तैनाती और पुनर्निर्माण कार्यों की शुरुआत को सुनिश्चित करना है।
मिस्री सूत्रों के मुताबिक, अमेरिकी अधिकारियों ने अरब देशों से कहा है कि इस मुद्दे पर गंभीर चर्चा इस्राईल के चुनावों के बाद की जाए। इस रुख को लेकर मिस्र ने चिंता जताई है।
मिस्र का कहना है कि यदि इस्राईल समझौते का उल्लंघन जारी रखता है, तो उससे निपटने के लिए ठोस उपाय खोजे जाने चाहिए।
राष्ट्रपति जोसेफ औन और प्रधानमंत्री नवाफ सलाम के साथ बातचीत में मिस्र के अधिकारियों ने जोर देकर कहा कि हिज़्बुल्लाह के हथियारों के मुद्दे पर बल प्रयोग या किसी सीधे संघर्ष से बचना चाहिए।
मिस्र का दावा है कि उसे ऐसी जानकारी मिली है कि तल अवीव हिज़्बुल्लाह की ओर से किसी संभावित उल्लंघन का इंतज़ार कर रहा है, ताकि वह अपने दायित्वों से पीछे हट सके और व्यापक सैन्य कार्रवाई का रास्ता खोल सके।
मिस्र के विदेश मंत्रालय के एक अधिकारी ने चेतावनी दी कि सबसे बड़ी समस्या यह है कि मौजूदा समय में लेबनान का मुद्दा अंतरराष्ट्रीय समुदाय की प्राथमिकताओं में शामिल नहीं है।

