समान नागरिक संहिता से पहले विभिन्न पर्सनल लॉ में संशोधन होना चाहिए

समान नागरिक संहिता से पहले विभिन्न पर्सनल लॉ में संशोधन होना चाहिए

यदि अनेकता में एकता से यह अर्थ निकाला जाए कि सभी लोगों को अपनी अलग-अलग पहचान मिटाकर एक हो जाना चाहिए, तो यह किसी भी साक्षर या अर्ध-साक्षर समाज में संभव नहीं है। यदि हमारे समाज के नेता इस बात को स्वीकार करते हैं, तो उन्हें यह भी स्वीकार करना चाहिए कि विवाह, तलाक, विरासत और गोद लेने जैसे पारिवारिक कानूनों की खामियां देर-सवेर दूर की जा सकती हैं, लेकिन किसी भी स्थिति में उन्हें धर्म के भेदभाव के बिना एक समान नहीं बनाया जा सकता है।

इसका प्राथमिक कारण यह है कि किसी भी समाज में जो लोग अपनी व्यक्तिगत पहचान के साथ सामूहिकता का हिस्सा होते हैं, उनकी अपनी व्यक्तिगत प्राथमिकताएँ होती हैं। अगर समान नागरिक संहिता को अपनाने वालों को यह समझ में आ गया तो हंगामा क्यों मच रहा है! और यदि समझ न आया हो तो एकता में सम्मिलित पारिवारिक मामलों की बहुलता की पृथक पहचान को मिटाने का निरर्थक प्रयास छोड़ देना चाहिए।

सरकार समान नागरिक संहिता के जरिए सरकार विभिन्न जातियों और और उनके विवाह, तलाक, विरासत और गोद लेने जैसे पारिवारिक कानूनों को एक समान बनाना चाहती है। हालाँकि, उसके लिए जहाँ से प्रारंभिक कदम उठाया गया है वहाँ से वास्तविक सफलता की ओर बढ़ने का कोई रास्ता नहीं है। पारिवारिक कानून जिन मान्यताओं और विचारधाराओं में निहित हैं, वास्तविक सुधार वहीं करने की जरूरत है जहां वास्तविक खामियां हैं।

लेकिन कोई भी सरकार उन लोगों की राय लेकर ऐसा नहीं कर सकती जो अपनी जानकारी पर ज़्यादा विश्वास करते हैं। हमारे समाज में अधिकांश लोग सोचने और निर्णय लेने में सक्षम नहीं हैं। दूसरे शब्दों में, उन्हें जानबूझकर अन्य राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक हलकों द्वारा ऐसी स्थिति में ले जाया गया है जहां वे स्वयं निर्णय लेने में असमर्थ हैं। ऐसी स्थिति में, कोई भी समकालीन शासक उन लोगों को कल उसके खिलाफ खड़े होने से नहीं रोक सकता, जो आस्था और दान की शर्त रखते हैं।

आम मुसलमानों को उनके मीडिया-प्रेमी नेताओं ने सफलतापूर्वक, बल्कि चतुराई से, यह आभास दे दिया है कि उनसे उनका इस्लामी पारिवारिक कानून छीन लिया जाएगा। ऐसी स्थिति में भारत के इस्लामी राष्ट्र को यह बताना बहुत मुश्किल काम है कि उनके नेता उनके खिलाफ जिन कानूनों का बचाव कर रहे हैं उनमें से अधिकांश कई मामलों में पवित्र पुस्तक क़ुरआन के अनुरूप नहीं हैं, बल्कि वह अंग्रेजों द्वारा तैयार किए गए हैं।

पिछले कुछ महीनों में तीन तलाक के मामले का हश्र हम सबने देखा है। मामले के एक चरण में सरकारी वकीलों की लिखित दलील के जवाब में मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के वकीलों के पास केवल यह तर्क रह गया था कि हमें अपने तरीके से जीने की संवैधानिक गारंटी है। आज भी जमीयत उलेमा हिंद के एक बयान में यही बात दोहराई जा रही है। इस पृष्ठभूमि में समान नागरिक संहिता से भीड़ नियंत्रण की राजनीति का धंधा ही चल सकता है, देश और देश की जनता का कोई भला नहीं हो सकता।

इसमें कोई विवाद नहीं है कि समान नागरिक संहिता भारत के संविधान के अनुच्छेद 44 में निहित राज्य नीति का निदेशक सिद्धांत है। अनुच्छेद 44 में कहा गया है कि ”सरकार पूरे भारत के नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता बनाने का प्रयास करेगी।” यहां प्रयास शब्द का संबंध किसी प्रभुत्व या राजनीतिक व्यवसाय से नहीं है। अब ये हमारा दुर्भाग्य है कि हम या तो अपनी बात मनवाना चाहते हैं या फिर जनता को भ्रमित करने के धंधे में लग जाते हैं। अगर यह बीमारी सिर्फ राजनीतिक होती तो सामाजिक और सांस्कृतिक ताकतें अब तक इसका इलाज कर चुकी होतीं। दुर्भाग्य से, हमारे जीवन के हर पहलू मे लोग इस अज्ञानता का फायदा उठाने की कोशिश कर रहे हैं।

यहां यह समझना जरूरी है कि अगर समान नागरिक संहिता लागू करना बेहद संवेदनशील मुद्दा है तो एक से अधिक धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान रखने वाले संप्रदायों और जातियों के व्यक्तिगत अधिकारों और मान्यताओं में इस तरह से सुधार क्यों नहीं किया जाता कि उन सभी को एक ही डंडे से पीटने की जरूरत न पड़े। वास्तविक आवश्यकता यह है कि जिम्मेदार पक्ष, चाहे सरकारी हों या सामाजिक, जिनमें विभिन्न संप्रदायों के धार्मिक नेता और समुदाय के प्रतिनिधि शामिल हों। सभी आवश्यक/अनावश्यक चिंताओं को दूर करने और आम सहमति बनाने के लिए सभी प्रासंगिक हितधारकों के साथ रचनात्मक चर्चा शुरू करें।

हालांकि ऐसा कहीं होता नजर नहीं आ रहा है। फिर भी यदि इस दिशा में कोई कदम उठाया जाता है तो उसके पहले कदम में विभिन्न धार्मिक सम्प्रदायों के व्यक्तिगत कानूनों के वर्तमान स्वरूप की पूर्ण समीक्षा करने की आवश्यकता है, जिसमें यद्यपि कुछ खामियाँ भी हैं। समान नागरिक संहिता के स्वरुप और विरोध से केवल राजनीतिक बयानबाजी के अलावा कोई रचनात्मक उद्देश्य पूरा नहीं होगा।

इस संबंध में नीयत यह सुनिश्चित करने में होनी चाहिए कि यदि एक समान नागरिक संहिता का मसौदा तैयार किया जाता है, तो इसमें सभी व्यक्तिगत कानूनों के उन खंडों और प्रावधानों को शामिल किया जाएगा जो केवल न्याय, समानता और गैर-भेदभाव से संबंधित हैं। आवश्यक रूप से यह स्थिति किसी के राजनीतिक हित के अनुरूप नहीं, बल्कि संविधान की आवश्यकताओं के अनुरूप ही होगी।

यदि विभिन्न धार्मिक सम्प्रदायों के व्यक्तिगत कानूनों के वर्तमान स्वरूप की पूर्ण समीक्षा की इस प्रक्रिया को बिल्ली के गले में घंटी बाँधने की स्थिति से न गुजरना पड़े, तो समय की गति बताती है कि कुछ ही वर्षों में यह किया जा सकता है और एक व्यापक और सक्षम भारतीय राष्ट्र एक स्वीकार्य समान नागरिक संहिता तक पहुंच कर दुनिया के लिए एक उदाहरण स्थापित कर सकता है। इस अच्छे काम के लिए जिम्मेदार पार्टियों को तुरंत एक ही काम करना चाहिए कि जनता को भाजपा-कांग्रेस राजनीति की खबरों से भ्रमित करने के बजाय पत्रकारों को सामाजिक जिम्मेदारी का एहसास कराना चाहिए।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): ये लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए IscPress उत्तरदायी नहीं है।

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