एसआईआर क़ानूनी प्रक्रिया तो है, लेकिन अन्यायपूर्ण है: पूर्व चुनाव आयुक्त लवासा
पूर्व चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने मतदाता सूचियों की चल रही विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया (SIR) को लाखों लोगों पर थोपा जाने वाला एक अनुचित प्रक्रिया बताया है। उन्होंने कहा कि, भले ही न्यायपालिका ने इस प्रक्रिया को मंजूरी दी है और सरकार ने इसे क़ानूनी बताया है, लेकिन असली सवाल यह है कि क्या यह प्रक्रिया निष्पक्ष भी है?
गुरुवार को एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) की ओर से आयोजित जगदीप सिंह छोकर मेमोरियल व्याख्यान को संबोधित करते हुए लवासा ने कहा, “निश्चित रूप से यह क़ानूनी है, लेकिन क्या यह निष्पक्ष है? यही सवाल है, क्योंकि न्याय का वास्तविक अर्थ यही है।”
लवासा ने अपने संबोधन में यह भी कहा कि “क़ानूनी संस्थाएं, संवैधानिक संस्थाएं और सरकारें तेजी से इस सिद्धांत पर काम करती दिखाई दे रही हैं कि वे जो कुछ कर रही हैं, वह केवल इसलिए सही है क्योंकि क़ानून इसकी अनुमति देता है।”
उन्होंने SIR की कार्रवाई को लाखों नागरिकों पर थोपी जाने वाली एक अनुचित प्रक्रिया बताते हुए कहा कि “जिसकी लाठी, उसकी भैंस” का सिद्धांत अब पुराना हो चुका है। उनके अनुसार, क़ानून लागू करने की जिम्मेदारी निभाने वाले संस्थानों को केवल क़ानून के शब्दों का ही नहीं, बल्कि उसकी भावना और मूल उद्देश्य का भी पालन करना चाहिए।
उनका कहना था कि न्याय केवल क़ानून की शब्दशः व्याख्या और उसके अनुपालन का नाम नहीं है, बल्कि कानून की भावना और उसके उद्देश्य की रक्षा करना भी न्याय का हिस्सा है।
लवासा ने मतदाता सूचियों से 13 करोड़ नाम हटाए जाने के औचित्य पर भी सवाल उठाया। उन्होंने पूछा कि क्या यह सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त कदम उठाए जा रहे हैं कि इस प्रक्रिया के कारण मतदाता खुद को लोकतांत्रिक प्रक्रिया से दूर या अलग-थलग महसूस न करें।
SIR को लेकर बढ़ती बेचैनी की ओर इशारा करते हुए लवासा ने कहा कि 33 प्रतिशत लोग मतदान नहीं करते हैं, और इतने बड़े पैमाने पर मतदाता सूचियों में बदलाव नागरिकों को लोकतांत्रिक प्रक्रिया से और अधिक विमुख कर सकता है।
जब चुनाव आयोग बिहार में SIR की तैयारी कर रहा था, तब उसके अधिकारियों ने दावा किया था कि जमीनी स्तर पर काम करने वाले उसके कर्मचारियों ने बांग्लादेश, नेपाल और म्यांमार के कई नागरिकों की पहचान की है। हालांकि, चुनाव आयोग ने ऐसे लोगों की संख्या या उनके संबंध में कोई ठोस सबूत सार्वजनिक नहीं किया।

