रिलायंस का ट्रंप जूनियर से जुड़ी रिफाइनरी में 100 मिलियन डॉलर का निवेश: रिपोर्ट
एक रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी टैरिफ़ के दबाव के बीच रिलायंस इंडस्ट्रीज़ ने ट्रम्प जूनियर से जुड़े एक रिफाइनरी स्टार्टअप में 100 मिलियन डॉलर का निवेश किया। यह निवेश ऐसे समय में किया गया जब ट्रम्प प्रशासन सार्वजनिक रूप से मुकेश अंबानी के कारोबारी हितों पर भारी टैरिफ़ लगा रहा था।
9 जून को प्रकाशित एक खोजी रिपोर्ट के मुताबिक, मुकेश अंबानी की रिलायंस इंडस्ट्रीज़ ने टेक्सास स्थित एक अपेक्षाकृत कम-ज्ञात तेल रिफाइनरी स्टार्टअप में कम-से-कम 100 मिलियन डॉलर का निवेश किया। इस स्टार्टअप ने कथित तौर पर गुप्त रूप से डोनाल्ड ट्रम्प जूनियर को कंपनी में हिस्सेदारी दे रखी थी।
यह स्टार्टअप, “अमेरिका फर्स्ट रिफाइनिंग”, मेक्सिको की खाड़ी के तट पर स्थित ब्राउन्सविल बंदरगाह में लगभग आधी सदी बाद अमेरिका की पहली बड़ी नई तेल रिफाइनरी बनाने की योजना पर काम कर रहा है।
रिपोर्ट के अनुसार, अंबानी के निवेश से पहले यह परियोजना लगभग ठप पड़ चुकी थी और एक दशक से निवेश जुटाने में असफल रही थी। इसी दौरान ट्रम्प जूनियर ने चुपचाप इस स्टार्टअप में हिस्सेदारी हासिल की। इसके बाद कंपनी ने विदेशी निवेशकों के साथ बैठकों में ट्रम्प परिवार से अपने संबंधों को एक महत्वपूर्ण आकर्षण (Selling Point) के रूप में प्रस्तुत किया।
बाद में अंबानी परिवार के पास व्हाइट हाउस तक पहुंच बनाने के पर्याप्त कारण थे। रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद रिलायंस ने रियायती दरों पर रूसी कच्चा तेल खरीदकर अरबों डॉलर का लाभ कमाया था। लेकिन ट्रम्प प्रशासन की नाराज़गी बढ़ने पर अगस्त 2025 में भारत पर लगाए गए अमेरिकी शुल्क (टैरिफ़) को दोगुना करके 50 प्रतिशत कर दिया गया, ताकि रिलायंस जैसी कंपनियों पर रूसी तेल खरीदना बंद करने का दबाव बनाया जा सके।
हालांकि, नवंबर 2025 में ट्रम्प जूनियर के जामनगर दौरे के कुछ महीनों बाद, फरवरी 2026 तक अमेरिका और भारत के बीच एक व्यापार समझौता हो गया, जिससे टैरिफ़ में कमी आई।
इसी दौरान रिलायंस को वेनेज़ुएला का तेल खरीदने के लिए अमेरिकी लाइसेंस भी मिल गया। इसके अलावा, ईरान से जुड़े तनाव के बाद भारत को रूसी कच्चे तेल की खरीद पर लागू प्रतिबंधों से छूट भी प्रदान की गई। मार्च 2026 में स्वयं डोनाल्ड ट्रम्प ने सोशल मीडिया पर अंबानी के निवेश को “शानदार निवेश” बताया।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि ट्रम्प जूनियर ने स्वयं को केवल “एक निष्क्रिय अल्पसंख्यक निवेशक” (Passive Minority Investor) बताया है। इसके बावजूद ऊर्जा क्षेत्र के कई विशेषज्ञों को अब भी संदेह है कि यह रिफाइनरी वास्तव में कभी बन पाएगी या नहीं, क्योंकि वॉल स्ट्रीट नई रिफाइनरी परियोजनाओं के वित्तपोषण के लिए उत्सुक नहीं दिख रही है।
जांच से यह निश्चित रूप से साबित नहीं होता कि ब्राउन्सविल रिफाइनरी परियोजना आगे बढ़ेगी या नहीं, लेकिन इससे यह अवश्य स्पष्ट होता है कि इस परियोजना से संबंधित बातचीत ऐसे समय में चल रही थी जब भारत द्वारा रूसी कच्चे तेल की खरीद को लेकर राजनीतिक दबाव लगातार बढ़ रहा था। इससे ऐसे हालात पैदा हुए जिनका लाभ अंततः एक ही समूह को मिलता हुआ दिखाई देता है।

