देशभर की अदालतों में 4 करोड़ 76 लाख से अधिक मामले लंबित
केंद्र सरकार ने संसद को बताया कि देशभर की अदालतों में 4 करोड़ 76 लाख से अधिक मामले लंबित हैं। इनमें हाईकोर्ट में 63 लाख 66 हजार से अधिक और सुप्रीम कोर्ट में 92 हजार 101 मामले शामिल हैं। सरकार ने मामलों के शीघ्र निपटारे के लिए कई क़दम उठाने की प्रतिबद्धता दोहराई है।
विधि एवं न्याय राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) अर्जुन राम मेघवाल ने एक प्रश्न के उत्तर में बताया कि नेशनल ज्यूडिशियल डेटा ग्रिड (NJDG) पर उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार 31 दिसंबर 2025 तक जिला और अधीनस्थ अदालतों में 4,76,35,728 मामले लंबित थे।
मंत्री ने यह भी बताया कि 31 दिसंबर 2025 तक सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामलों की संख्या 92,101 थी, जो पिछले तीन वर्षों में 11.40 प्रतिशत की वृद्धि दर्शाती है। आंकड़ों के अनुसार 31 दिसंबर 2025 तक देश की 25 हाई कोर्टों में कुल 63,66,023 मामले लंबित थे, जो इसी अवधि के दौरान 4.75 प्रतिशत की वृद्धि है।
हाईकोर्टों में सबसे अधिक लंबित मामले इलाहाबाद हाईकोर्ट में हैं, जहां 12,07,240 मामले लंबित हैं। इसके बाद बॉम्बे हाईकोर्ट में 6,64,979 और राजस्थान हाईकोर्ट में 6,87,595 मामले लंबित हैं। जिला और अधीनस्थ अदालतों में लंबित मामलों की संख्या पिछले तीन वर्षों में 5.84 प्रतिशत बढ़ी है, जो 31 दिसंबर 2025 तक बढ़कर 4,76,57,328 हो गई।
राज्यवार आंकड़ों के अनुसार, केवल उत्तर प्रदेश में जिला और अधीनस्थ अदालतों में 1,13,45,328 मामले लंबित हैं, जबकि महाराष्ट्र में 59,26,999 और पश्चिम बंगाल में 38,35,113 मामले लंबित हैं।
मंत्री ने कहा कि मामलों का निपटारा न्यायपालिका का विशेष अधिकार क्षेत्र है, हालांकि सरकार ने त्वरित निर्णय के लिए कई कदम उठाए हैं। इनमें न्यायिक बुनियादी ढांचे को मजबूत करना, अदालतों का कंप्यूटरीकरण, रिक्त पदों को भरना और वैकल्पिक विवाद निपटान तंत्र को बढ़ावा देना शामिल है।
उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत त्वरित न्याय सुनिश्चित करने और लंबित मामलों को कम करने के लिए प्रतिबद्ध है। न्यायपालिका को तेजी से निर्णय देने के लिए अनुकूल व्यवस्था प्रदान करने हेतु कई कदम उठाए गए हैं।
सरकार ने न्याय वितरण और कानूनी सुधारों के लिए राष्ट्रीय मिशन, लोक अदालतों को बढ़ावा, वाणिज्यिक और आपराधिक कानूनों में संशोधन तथा ई-कोर्ट परियोजना पर जोर दिया है, ताकि मामलों में होने वाली देरी को कम किया जा सके और न्यायपालिका के सभी स्तरों पर केस मैनेजमेंट को बेहतर बनाया जा सके।

