रेप मामले में इलाहबाद हाइकोर्ट की टिप्पणी पर कानून विशेषज्ञों ने जताई नाराज़गी
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक मामले में अहम फैसला सुनाते हुए कहा है कि नाबालिग लड़की के स्तन को पकड़ना, उसके पायजामे के नाड़े को तोड़ना और उसे पुलिया के नीचे खींचने का प्रयास करना रेप या रेप की कोशिश के तहत अपराध नहीं माना जा सकता। कानून विशेषज्ञों ने यौन अपराध जुड़े एक मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट की ओर से सुनाए गए फैसले में की गई उस टिप्पणी की शुक्रवार को निंदा की है।
मामला उत्तर प्रदेश के कासगंज में 11 साल की एक लड़की से जुड़ा है, जिस पर 2021 में दो लोगों ने हमला किया था। इलाहाबाद हाईकोर्ट की न्यायमूर्ति राम मनोहर नारायण मिश्रा की पीठ ने फैसला सुनाया कि केवल निजी अंगों को पकड़ना और पायजामा का नाड़ा तोड़ना बलात्कार के अपराध की श्रेणी में नहीं आता है। ऐसा अपराध किसी महिला को निर्वस्त्र करने के इरादे से उस पर हमला करने या आपराधिक बल प्रयोग के दायरे में आता है।
हाईकोर्ट की इस टिप्पणी पर अब कपिल सिब्बल का भी बयान सामने आया है। सीनियर एडवोकेट और सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष कपिल सिब्बल ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट में कहा, ‘भगवान ही इस देश को बचाए, क्योंकि पीठ में इस तरह के न्यायाधीश विराजमान हैं! सुप्रीम कोर्ट गलती करने वाले जजों से निपटने के मामले में बहुत नरम रहा है।
कपिल सिब्बल ने कहा कि जजों, खासकर हाईकोर्ट के जजों को ऐसी टिप्पणियां करने से बचना चाहिए, क्योंकि इससे समाज में गलत संदेश जाएगा और लोगों का न्यायपालिका पर से भरोसा उठ जाएगा।
उन्होंने कहा, ‘मुझे लगता है कि इस तरह की विवादास्पद टिप्पणी करना अनुचित है, क्योंकि मौजूदा समय में न्यायाधीश जो कुछ भी कहते हैं, उससे समाज में एक संदेश जाता है. अगर न्यायाधीश, खासतौर पर हाईकोर्ट के जज, इस तरह की टिप्पणियां करते हैं, तो इससे समाज में गलत संदेश जाएगा और लोगों का न्यायपालिका पर से भरोसा उठ जाएगा।
कानून विशेषज्ञों ने जजों से संयम बरतने का आह्वान किया. उन्होंने कहा कि इस तरह की टिप्पणियों से ज्यूडिशियरी में लोगों का भरोसा कम होता है। सीनियर एडवोकेट और पूर्व अतिरिक्त महाधिवक्ता पिंकी आनंद ने कहा कि मौजूदा दौर में, खासतौर पर सतीश बनाम महाराष्ट्र राज्य जैसे मामलों के बाद, इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले ने बलात्कार के प्रयास जैसे जघन्य अपराध को कमतर करके आंका है, जो न्याय का उपहास है।
पिंकी आनंद ने कहा, अब पुन: जागृत होने का समय आ गया है। उन्होंने कहा, ‘कानून का उल्लंघन करने वालों और महिलाओं और बच्चों के खिलाफ अपराध करने वालों को बख्शा नहीं जा सकता और यह फैसला स्पष्ट रूप से गलत है, क्योंकि यह इस बात को नजरअंदाज करता है। मुझे पूरा भरोसा है कि इस तरह के फैसले को उचित तरीके से पलटा जाएगा और न्याय होगा।
वरिष्ठ अधिवक्ता विकास पाहवा ने कहा कि इलाहाबाद हाईकोर्ट की व्याख्या, बलात्कार के प्रयास की संकीर्ण परिभाषा देकर एक चिंताजनक मिसाल कायम करती प्रतीत होती है। निजी अंगों को पकड़ने, पायजामा उतारने और लड़की को घसीटकर पुलिया के नीचे ले जाने” जैसी कथित हरकतें स्पष्ट रूप से बलात्कार की मंशा की ओर इशारा करती हैं, जो संभवतः महज इरादे से कहीं आगे दुष्कर्म के प्रयास के दायरे में आती हैं।
इस तरह के फैसलों से यौन हिंसा के पीड़ितों की सुरक्षा के प्रति न्यायिक प्रणाली की प्रतिबद्धता में जनता का विश्वास कम होने का खतरा है। ऐसे फैसले पीड़ितों को आगे आने से भी हतोत्साहित कर सकते हैं, क्योंकि उन्हें डर होगा कि उनके साथ हुई हरकतों को कमतर आंका जाएगा या खारिज कर दिया जाएगा। वरिष्ठ अधिवक्ता पीके दुबे ने पाहवा की राय से सहमति जताते हुए कहा कि इस तरह की व्याख्या उचित नहीं थी। न्यायाधीश के निजी विचारों के लिए कोई जगह नहीं है और उन्हें स्थापित कानून तथा न्यायशास्त्र का पालन करना चाहिए।
यौन अपराधों से जुड़े मामलों में इस बात पर विचार किया जाता है कि क्या किसी भी रूप में यौन मंशा जाहिर हुई, साथ ही यह तथ्य भी देखा जाता है कि उक्त कृत्य से क्या पीड़ित को चोट पहुंची। यौन प्रवेशन जरूरी नहीं है और इस तरह की हरकतें भी यौन कृत्य के बराबर हैं, जिनके लिए व्यक्ति को सजा दी जा सकती है। पीड़िता के निजी अंग को छूना ही काफी है और यह बलात्कार के बराबर है।