भारत और अमेरिका के बीच जेवलिन एंटी-टैंक मिसाइल का समझौता
भारत ने अमेरिकी निर्मित FGM-148 जेवलिन (Javelin) एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल प्रणाली हासिल करने के लिए अमेरिका के साथ औपचारिक समझौता किया है। भारतीय सेना ने अमेरिकी फॉरेन मिलिटरी सेल्स (FMS) कार्यक्रम के तहत लेटर ऑफ ऑफर एंड एक्सेप्टेंस (LOA) पर हस्ताक्षर किए हैं।
अमेरिकी सरकार ने नवंबर 2025 में भारत के लिए जेवलिन मिसाइल प्रणाली और उससे जुड़े उपकरणों की संभावित बिक्री को मंजूरी दी थी। इसकी अनुमानित कीमत 7.45 करोड़ डॉलर बताई गई थी। इस पैकेज में 100 FGM-148 जेवलिन मिसाइलें, एक फ्लाई-टू-बाय (Fly-to-Buy) मिसाइल और 25 कमांड लॉन्च यूनिट्स के साथ प्रशिक्षण उपकरण, स्पेयर पार्ट्स, तकनीकी सहायता और लॉजिस्टिक सपोर्ट शामिल थे।
इस समझौते को भारत और अमेरिका के बीच रक्षा सहयोग को और मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। हालांकि, मौजूदा अंतिम समझौते की वास्तविक वित्तीय कीमत और अंतिम मात्रा के बारे में अमेरिकी तथा भारतीय अधिकारियों ने अभी पूरी जानकारी जारी नहीं की है। इसलिए 7.45 करोड़ डॉलर को अंतिम समझौते की वास्तविक कीमत मानने के बजाय पहले मंजूर किए गए संभावित पैकेज की अनुमानित लागत के रूप में देखना अधिक उचित है।
जेवलिन एक मध्यम दूरी की, कंधे से दागी जाने वाली, मानव-पोर्टेबल और फायर-एंड-फॉरगेट (Fire-and-Forget) एंटी-टैंक हथियार प्रणाली है। इसका मुख्य उद्देश्य टैंकों और अन्य बख्तरबंद वाहनों को निशाना बनाना है। इसका इस्तेमाल कुछ मजबूत रक्षा ठिकानों के ख़िलाफ़ भी किया जा सकता है।
इसकी अधिकतम मारक दूरी 4,500 मीटर से अधिक बताई जाती है। इसकी फायर-एंड-फॉरगेट क्षमता विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। मिसाइल दागे जाने के बाद ऑपरेटर को लगातार उसे निर्देशित करने की आवश्यकता नहीं होती। इससे वह तुरंत अपनी स्थिति बदल सकता है या किसी सुरक्षित स्थान पर जा सकता है।
इस प्रणाली में टॉप-अटैक (Top-Attack) क्षमता भी मौजूद है। इसके जरिए मिसाइल टैंक के अपेक्षाकृत कम सुरक्षित ऊपरी हिस्से को निशाना बना सकती है।
जेवलिन की खरीद भारतीय सेना की एंटी-टैंक क्षमताओं को मजबूत करने के प्रयासों का हिस्सा है। विशेष रूप से आधुनिक युद्ध में बख्तरबंद वाहनों और टैंकों के खिलाफ ऐसे हथियार महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, जो दूर से सटीक निशाना लगाने और फायर करने के तुरंत बाद अपनी स्थिति बदलने की सुविधा देते हैं।
भारतीय सेना लगभग 2009 से जेवलिन प्रणाली में रुचि रखती रही है, लेकिन इसकी खरीद लंबे समय तक अंतिम रूप नहीं ले सकी।
इस समझौते का एक महत्वपूर्ण पहलू भविष्य में भारत में जेवलिन मिसाइलों के संयुक्त उत्पादन (Co-production) की संभावना भी है। भारत और अमेरिका पहले ही इस संबंध में बातचीत कर चुके हैं। वहीं, जेवलिन बनाने वाली अमेरिकी कंपनियों और भारत की भारत डायनेमिक्स लिमिटेड (BDL) के बीच भी भारत में इसके स्थानीय उत्पादन की संभावनाओं को लेकर सहयोग के प्रयास किए गए हैं।
भारत में अमेरिका के राजदूत सर्जियो गोर ने इस समझौते का स्वागत करते हुए इसे दोनों देशों के बीच बढ़ते रक्षा सहयोग का प्रतीक बताया। उनके अनुसार, भारत और अमेरिका के बीच यह साझेदारी लगातार और गहरी, प्रभावी तथा महत्वपूर्ण होती जा रही है।

