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“अगर अदालतें दमन का केंद्र बन गईं, तो जनता का न्याय व्यवस्था पर भरोसा ख़त्म हो जाएगा”: जस्टिस मुरलीधर

“अगर अदालतें दमन का केंद्र बन गईं, तो जनता का न्याय व्यवस्था पर भरोसा ख़त्म हो जाएगा”: जस्टिस मुरलीधर

वरिष्ठ अधिवक्ता और ओडिशा हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश एस. मुरलीधर ने भारत की न्याय व्यवस्था में सुधार की आवश्यकता पर ज़ोर देते हुए चेतावनी दी है कि, यदि अदालतें और उनकी कार्यप्रणाली स्वयं दमन का माध्यम बन गईं, तो लोगों का न्याय व्यवस्था पर विश्वास प्रभावित होगा। नई दिल्ली में डी.एस. बोर्कर मेमोरियल लेक्चर को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि, राज्य की शक्ति के सामने नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करने वाली मज़बूत सुरक्षा-दीवार के रूप में न्यायपालिका का रिकॉर्ड असंगत और कई मौकों पर निराशाजनक रहा है।

वरिष्ठ अधिवक्ता और ओडिशा हाई कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश एस. मुरलीधर ने न्यायपालिका की भूमिका और भारत की कानूनी व्यवस्था में सुधार को लेकर महत्वपूर्ण सवाल उठाए। उन्होंने चेतावनी दी कि, यदि अदालतें स्वयं दमन का केंद्र बन गईं, तो न्याय व्यवस्था तथा निष्पक्ष और समान न्याय प्रदान करने की उसकी क्षमता पर जनता का विश्वास कमजोर हो जाएगा।

नई दिल्ली स्थित इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में डी.एस. बोर्कर मेमोरियल लेक्चर को संबोधित करते हुए जस्टिस मुरलीधर ने कहा, “यदि अदालतें और उनकी कार्यप्रणाली स्वयं दमन के केंद्र बन गईं, तो इससे लोगों का न्याय व्यवस्था और उसकी निष्पक्ष एवं समान न्याय प्रदान करने की क्षमता पर विश्वास प्रभावित होगा।”

उन्होंने न्यायपालिका की संवैधानिक भूमिका की समीक्षा करते हुए कहा कि राज्य की शक्ति और नागरिकों के बीच एक मजबूत सुरक्षा-दीवार के रूप में न्यायपालिका का रिकॉर्ड “असंगत और अक्सर निराशाजनक” रहा है। उनके अनुसार, सरकारों के मनमाने फैसले, फैसले लेने में देरी या निष्क्रियता, शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शनों को अपराध बना देना और अनावश्यक गिरफ्तारियां लोगों को अदालतों का दरवाजा खटखटाने के लिए मजबूर करती हैं।

जस्टिस मुरलीधर ने न्यायालयों में लंबित मामलों की समस्या को केवल जजों की संख्या बढ़ाकर हल करने की धारणा को भी खारिज किया। उन्होंने कहा कि अदालतों की तुलना किसी कार असेंबली लाइन से नहीं की जा सकती और मुक़दमों का निपटारा कार बनाने जैसा काम नहीं है। उनके अनुसार, केवल अधिक जजों की नियुक्ति कर देने से लंबित मामलों की समस्या का प्रभावी समाधान नहीं होगा।

उन्होंने बताया कि जिला अदालतों में डेढ़ करोड़ से अधिक मामले लंबित हैं, जबकि हाई कोर्टों में लंबित मामलों की संख्या लगभग 65 लाख और सुप्रीम कोर्ट में करीब 93 हजार है। उनके मुताबिक मामलों में देरी के लिए केवल जजों को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। इसके पीछे पूरी कानूनी व्यवस्था में मौजूद संरचनात्मक कमियां भी एक बड़ी वजह हैं।

पूर्व मुख्य न्यायाधीश ने न्यायिक प्रशासन में मौजूद कुछ औपनिवेशिक और सामंती परंपराओं की भी आलोचना की। उनके अनुसार न्याय व्यवस्था में पदों और औपचारिक प्रोटोकॉल से जुड़ी कुछ पुरानी परंपराएं आज भी मौजूद हैं। इन्हें पहचानने, इनकी समीक्षा करने और आवश्यक होने पर इन्हें समाप्त करने की जरूरत है।

उन्होंने कानूनी व्यवस्था को न्याय पाने वाले व्यक्ति यानी वादी-केंद्रित बनाने की आवश्यकता पर भी जोर दिया। उनके अनुसार मौजूदा व्यवस्था में वकीलों, जजों और राज्य की सुविधा को अधिक महत्व मिलता है, जबकि आम नागरिक के लिए पेशेवर सहायता के बिना कानूनी प्रक्रियाओं की जटिलताओं से गुजरना अब भी मुश्किल है। उन्होंने कहा कि न्यायिक सुधार की असली कसौटी यह होनी चाहिए कि क्या आम नागरिक के लिए न्याय तक पहुंच पहले से अधिक आसान, सुलभ और निष्पक्ष हुई है या नहीं।

जस्टिस मुरलीधर ने अपने भाषण में भारत के भविष्य को लेकर नागरिक स्वतंत्रताओं और असहमति के अधिकार की रक्षा पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि कानून का इस्तेमाल लोगों के पहनावे या खान-पान की पसंद के आधार पर किसी समूह को निशाना बनाने के लिए नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वालों को अपराधी बनाने और सरकार की वैध आलोचना को अपराध घोषित करने की बढ़ती प्रवृत्ति के प्रति भी आगाह किया।

उन्होंने वर्तमान समय में बढ़ते आर्थिक और राजनीतिक शक्ति के केंद्रीकरण तथा तकनीक के संभावित दुरुपयोग पर भी चिंता व्यक्त की। उनके अनुसार, निगरानी तकनीक, सूचना पर कुछ शक्तिशाली संस्थानों का नियंत्रण और लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर किए जाने की संभावनाएं भविष्य के लिए गंभीर चुनौतियां हैं।

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