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वंदे मातरम पर सरकार का आदेश मनमाना और एकतरफा: अरशद मदनी

वंदे मातरम पर सरकार का आदेश मनमाना और एकतरफा: अरशद मदनी

केंद्र सरकार ने हाल ही में राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम’ को लेकर नया आदेश जारी किया है, जिसके तहत अब इसे सरकारी कार्यक्रमों, स्कूलों और औपचारिक आयोजनों में गाना और सुनना अनिवार्य होगा। आदेश में स्पष्ट किया गया है कि गीत के सभी छह अंतरे गाए जाएंगे, जिनकी कुल अवधि लगभग 3 मिनट 10 सेकंड है। पहले सिर्फ पहले दो अंतरे ही प्रचलित थे। साथ ही, यदि ‘वंदे मातरम’ और ‘जन गण मन’ एक साथ बजाए जाएं, तो पहले वंदे मातरम गाया जाएगा और सभी उपस्थित लोगों का खड़ा होना अनिवार्य होगा।

इस आदेश पर धार्मिक संगठनों ने विरोध जताया है। मुस्लिम संगठन जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने इसे धार्मिक स्वतंत्रता पर हमला बताया। संगठन के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने कहा कि मुसलमान किसी को गाने से नहीं रोकते, लेकिन कुछ छंद उनकी धार्मिक मान्यताओं के खिलाफ हैं क्योंकि गीत मातृभूमि को एक देवी रूप में प्रस्तुत करता है। उनका कहना था कि इसे अनिवार्य बनाना संविधान के अनुच्छेद 25 और सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के खिलाफ है और यह देशभक्ति का असली पैमाना नहीं बल्कि राजनीतिक और सांप्रदायिक एजेंडा दिखाता है।

सिख संगठन दल खालसा ने भी इसे सिख पहचान के खिलाफ बताया। उनके नेता कंवरपाल सिंह बिट्टू ने कहा कि यह हिंदुत्व विचारधारा को थोपने की कोशिश है और सिख समुदाय इसे स्वीकार नहीं करेगा।

सरकारी दिशानिर्देशों में बताया गया है कि वंदे मातरम राष्ट्रपति या राज्यपाल के आगमन, झंडारोहण और महत्वपूर्ण कार्यक्रमों में गाया जाएगा। वहीं, सिनेमा हॉल या डॉक्यूमेंट्री में इसे अनिवार्य नहीं किया जाएगा। ‘वंदे मातरम’ की रचना बंकिम चंद्र चटर्जी ने 1875 में की थी और यह आनंदमठ उपन्यास में प्रकाशित हुआ। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान यह भारत को ब्रिटिश शासन से मुक्त कराने वाले आंदोलन का प्रतीक बन गया। इस गीत का अर्थ है “हे मां, मैं तुम्हें नमन करता हूं।”

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