ईवीएम पर संदेह चुनावी प्रक्रिया से विश्वास ख़त्म कर देगा: पूर्व चुनाव आयुक्त

ईवीएम पर संदेह चुनावी प्रक्रिया से विश्वास ख़त्म कर देगा: पूर्व चुनाव आयुक्त

विधानसभा चुनाव के दौरान वोटों के अंतर और इसके बाद चुनावी नतीजों को लेकर जहां राजनीतिक दल शिकायत कर रहे हैं, वहीं विशेषज्ञ भी इस पर हैरानी जता रहे हैं। अब देश के पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस वाई कुरैशी ने चिंता जताते हुए कहा है कि चुनाव आयोग जिस तरह से काम कर रहा है, अगर ऐसा ही चलता रहा तो जनता का चुनावी प्रक्रिया पर से विश्वास उठ जाएगा। एस वाई कुरैशी ने यह बात इंडिया टुडे को दिए एक इंटरव्यू में कही है।

पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त का कहना है, “20 नवंबर को मतदान वाले दिन वोटों का जो प्रतिशत दर्ज किया गया था और अगले दिन चुनाव आयोग द्वारा जारी किए गए अंतिम आंकड़ों में जो अंतर दिखा, वह बेहद चिंताजनक है।” याद दिला दें कि 20 नवंबर की शाम को चुनाव आयोग ने महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में मतदान का प्रतिशत लगभग 58% बताया था, जबकि अगले दिन जारी किए गए अंतिम आंकड़े 65% थे, जो बाद में बढ़कर 67% हो गए। यह पिछले 30 वर्षों में अब तक का सबसे अधिक मतदान प्रतिशत था। कुरैशी का कहना है कि यह संभव ही नहीं है।

उन्होंने बताया, “मतदान के दिन जब वोट डाले जाते हैं तो उनकी गिनती भी साथ-साथ होती जाती है। चुनाव अधिकारी हर वोट को गिनता है। जब मतदान खत्म हो जाता है, तो वही गिनती “फॉर्म 17सी” में दर्ज की जाती है। इसके बाद इस फॉर्म पर सभी उम्मीदवारों के पोलिंग एजेंट्स के हस्ताक्षर लिए जाते हैं।”

उन्होंने कहा, “फॉर्म 17सी में हर पोलिंग बूथ पर कितने वोट डाले गए, यह उसी समय लिखा जाता है। यह रीयल-टाइम डेटा होता है। अगले दिन इसमें बदलाव कैसे हो सकता है, यह मेरी समझ से बाहर है। एस वाई कुरैशी ने कहा, “इस मामले में चुनाव आयोग को स्पष्टता देनी चाहिए। उन्हें सवालों का जवाब देना चाहिए। देश में ईवीएम को लेकर जो अविश्वास फैल रहा है, अगर यह लोगों के दिमाग में बैठ गया, तो जनता का चुनावी प्रक्रिया पर से विश्वास खत्म हो जाएगा।

याद दिला दें कि हरियाणा की तरह महाराष्ट्र चुनाव में भी भाजपा दोगुनी ताकत के साथ सत्ता में वापस आई। इस वजह विपक्षी दलों में ईवीएम को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं।गौरतलब है कि एस वाई कुरैशी 2010 से 2012 तक देश के मुख्य चुनाव आयुक्त रह चुके हैं। वह चुनावी प्रक्रिया के हर पहलू से भलीभांति परिचित हैं। इसलिए इंडिया टुडे को दिया गया उनका यह इंटरव्यू चर्चा का विषय बना हुआ है।

चुनावी आंकड़ों के संबंध में काम करने वाला संस्थान एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स इस मामले में अदालत का दरवाजा खटखटा चुका है, लेकिन अदालत ने यह कहकर याचिका को ख़ारिज कर दिया कि वह किसी भी संवैधानिक संस्था की कार्यप्रणाली में हस्तक्षेप नहीं कर सकती। याद रहे कि यह मामला सिर्फ वोटों के प्रतिशत का नहीं है, बल्कि महाराष्ट्र के कई विधानसभा क्षेत्रों में विभिन्न प्रकार की शिकायतें मिली हैं।

जैसे पाचोरा में शिकायत की गई थी कि एक बूथ पर वोटों की गिनती ही नहीं हुई। चुनाव आयोग ने स्वीकार किया कि गिनती नहीं हुई क्योंकि फॉर्म 17सी में गड़बड़ी थी और वोटों का अंतर इतना था कि उस बूथ की गिनती की जरूरत नहीं थी। फॉर्म 17सी में गड़बड़ी कैसे हुई, इसका कोई जवाब नहीं दिया गया।

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