“हिरासत में यातना पुलिस की ड्यूटी का हिस्सा नहीं, अपराध है: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बांदा जिले में पुलिस हिरासत में यातना और महिलाओं के साथ छेड़छाड़ के आरोपी पुलिसकर्मियों को राहत देने से इनकार कर दिया है। न्यायमूर्ति मदन पाल सिंह ने कहा कि हिरासत में लिए गए एक वकील, उनकी 60 वर्षीय पत्नी और दो नाबालिग बेटियों को बेरहमी से पीटना और उनके साथ छेड़छाड़ करना पुलिस की ड्यूटी का हिस्सा नहीं, बल्कि अपराध है। इस तरह की हिंसा को पुलिस की ड्यूटी का हिस्सा नहीं माना जा सकता।
अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसी हरकतों के लिए पुलिसकर्मियों को दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 197 के तहत मुकदमा चलाने से पहले सरकार की मंजूरी लेने की सुरक्षा नहीं मिलेगी। हाईकोर्ट ने महिला कांस्टेबल शिवानी जोशी और दो अन्य पुलिसकर्मियों की याचिका ख़ारिज करते हुए बांदा के विशेष न्यायाधीश द्वारा 27 सितंबर 2024 को दिए गए आदेश को बरक़रार रखा है।
विवरण के अनुसार, बांदा के बबेरू थाने में हिमाचल प्रसाद की शिकायत पर वर्ष 2021 में अधिवक्ता केशव प्रसाद यादव, उनके बेटों धनीश, योगेंद्र और अन्य के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई थी। जांच के दौरान सब-इंस्पेक्टर दिलीप कुमार मिश्रा ने आरोपियों से जांच में सहयोग लेने के लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 41-ए के तहत नोटिस जारी किए। इन नोटिसों का पालन कराने के लिए चार कांस्टेबलों को पड़री गांव भेजा गया।
अभियोजन पक्ष के अनुसार, आरोपियों और उनके परिवार के सदस्यों ने कथित तौर पर पुलिस कांस्टेबलों के साथ गाली-गलौज और मारपीट की। उन्होंने नोटिस फाड़ दिए या छीन लिए, ईंट और पत्थर फेंके और कथित तौर पर कांस्टेबल सुखबीर सिंह का मोबाइल फोन भी छीन लिया।
इस घटना के बाद पुलिस बल को गांव भेजा गया। 13 मई 2022 की रात चार महिलाओं को गिरफ्तार किया गया, जबकि अगले दिन एक मुख़बिर सहित चार पुरुषों को गिरफ्तार किया गया। इसके बाद शिकायतकर्ता ने पुलिसकर्मियों पर अवैध रूप से मारपीट करने, महिलाओं के साथ छेड़छाड़ करने, हिरासत में यातना देने, लूटपाट करने और झूठे मुकदमे में फंसाने के आरोप लगाए। कुछ ही सप्ताह बाद पुलिस को इलाहाबाद हाईकोर्ट की फटकार का सामना करना पड़ा।

