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मक्का रक्षा समझौते से बदलते समीकरण, भारत के सामने कितनी बड़ी चुनौती?

सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान के बीच हुआ मक्का संयुक्त रक्षा समझौता पश्चिम एशिया और दक्षिण एशिया की बदलती रणनीतिक तस्वीर में एक अहम घटनाक्रम माना जा रहा है। समझौते के मुताबिक, तीनों में से किसी एक देश पर होने वाला हमला सभी तीन देशों पर हमला माना जाएगा। इस प्रावधान ने इस समझौते की तुलना नाटो के आर्टिकल-5 से किए जाने की चर्चा शुरू कर दी है।

भारत भी इस नए सुरक्षा समीकरण पर करीबी नजर रख रहा है। हालांकि, जानकारों का मानना है कि समझौते का वास्तविक महत्व तभी स्पष्ट होगा, जब भविष्य में तीनों में से किसी देश के सामने गंभीर सैन्य संकट पैदा होगा और बाकी दो देश उसकी मदद के लिए किस हद तक आगे आते हैं।

इस समझौते की सभी शर्तें अभी सार्वजनिक नहीं हैं, इसलिए इसके वास्तविक दायरे का आकलन करना जल्दबाजी होगा। फिर भी पाकिस्तान के लिए इसका मनोवैज्ञानिक और कूटनीतिक महत्व काफी बड़ा है।

पाकिस्तान इस समझौते के जरिए यह संदेश देने की कोशिश कर सकता है कि किसी बड़े संकट की स्थिति में वह अकेला नहीं होगा। खासकर भारत के साथ भविष्य में सैन्य तनाव की स्थिति में इस्लामाबाद को उम्मीद हो सकती है कि तुर्की और सऊदी अरब किसी न किसी रूप में उसके साथ खड़े होंगे।

हालांकि, ऐसा फैसला दोनों देशों के लिए आसान नहीं होगा। सऊदी अरब और तुर्की के अपने अलग क्षेत्रीय हित, आर्थिक रिश्ते और सुरक्षा प्राथमिकताएं हैं। इसलिए भारत-पाकिस्तान संघर्ष की स्थिति में उनका समर्थन किस स्तर तक होगा, यह पहले से तय मान लेना उचित नहीं होगा।

भारत और सऊदी अरब के रिश्ते केवल रक्षा या कूटनीति तक सीमित नहीं हैं। दोनों देशों के बीच व्यापार, ऊर्जा और निवेश के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण संबंध हैं। भारत सऊदी अरब के बड़े बाजारों में शामिल है, जबकि सऊदी अरब भारत के प्रमुख आर्थिक साझेदारों में गिना जाता है।

इसी वजह से जानकार मानते हैं कि नई रक्षा साझेदारी के बावजूद रियाज़ के लिए भारत और पाकिस्तान के बीच संतुलन बनाए रखना महत्वपूर्ण रहेगा। किसी सैन्य संकट की स्थिति में सऊदी अरब सीधे किसी एक पक्ष का समर्थन करने के बजाय तनाव कम कराने की कोशिश कर सकता है।

फिर भी पाकिस्तान सऊदी अरब से आर्थिक सहयोग के अलावा रक्षा क्षेत्र में हथियार, स्पेयर पार्ट्स और दूसरे सैन्य संसाधनों की उम्मीद कर सकता है। दोनों देशों के बीच पहले से मौजूद सैन्य सहयोग और सऊदी सुरक्षा ढांचे में पाकिस्तानी सैन्यकर्मियों की मौजूदगी इस रिश्ते की गहराई को दिखाती है।

तुर्की का मामला सऊदी अरब से अलग है। भारत के साथ उसके संबंध अपेक्षाकृत सीमित हैं, जबकि पाकिस्तान के साथ अंकारा के रक्षा और सैन्य रिश्ते लगातार मजबूत हुए हैं। ऐसे में मक्का समझौते के बाद तुर्की की भूमिका भारत के लिए विशेष महत्व रखती है। बदलते क्षेत्रीय समीकरणों के बीच भारत को अपने रणनीतिक साझेदारों के साथ संपर्क और मजबूत करना होगा। संयुक्त अरब अमीरात के साथ भारत के आर्थिक और सामरिक रिश्ते पहले से मजबूत हैं। इसके अलावा आर्मेनिया को ब्रह्मोस मिसाइलों की आपूर्ति और पूर्वी एशियाई देशों के साथ बढ़ता रक्षा सहयोग भी भारत की व्यापक रणनीतिक नीति का हिस्सा माना जा सकता है।

हालांकि इस समझौते को केवल औपचारिक या प्रतीकात्मक पहल मानना भी ठीक नहीं होगा। ईरान के साथ हालिया संघर्षों ने सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान के सामने कुछ साझा सुरक्षा चिंताएं पैदा की हैं।

सऊदी अरब लंबे समय से ईरान के साथ अपने संबंधों को लेकर सतर्क रहा है। हाल की घटनाओं ने उसकी सुरक्षा संबंधी चिंताओं को और बढ़ाया है। वहीं, तुर्की के इस्राईल के साथ भी कई मुद्दों पर मतभेद हैं। ऐसे माहौल में तीनों देशों के लिए क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर सहयोग बढ़ाने का आधार तैयार हुआ है।

तीनों देशों की अपनी-अपनी ताकत भी है। पाकिस्तान परमाणु क्षमता वाला देश है, सऊदी अरब के पास विशाल आर्थिक और ऊर्जा संसाधन हैं, जबकि तुर्की नाटो का सदस्य होने के साथ अपने रक्षा उद्योग को भी तेजी से विकसित कर रहा है।

मक्का समझौते की सबसे बड़ी ताकत शायद किसी युद्ध में सीधे उतरना नहीं, बल्कि संभावित विरोधियों को रोकने की उसकी क्षमता हो सकती है। यदि तीनों देश इस समझौते को गंभीरता से लागू करते हैं तो यह क्षेत्रीय शक्ति-संतुलन को प्रभावित कर सकता है।

भारत के लिए चुनौती यह है कि वह सऊदी अरब के साथ अपने मजबूत आर्थिक संबंधों को बनाए रखते हुए पाकिस्तान-तुर्की की बढ़ती सुरक्षा साझेदारी पर भी नजर रखे। साथ ही अमेरिका, रूस, यूरोपीय संघ और अन्य क्षेत्रीय शक्तियों के साथ कूटनीतिक संपर्क बढ़ाना भारत के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है।

इसलिए फिलहाल मक्का समझौते को भारत के खिलाफ सीधे सैन्य गठबंधन के रूप में देखना जल्दबाजी होगी। लेकिन यह पश्चिम एशिया और दक्षिण एशिया के बीच बन रहे नए रणनीतिक समीकरणों का संकेत जरूर है। इसकी असली परीक्षा तब होगी, जब किसी सदस्य देश को वास्तविक सुरक्षा संकट का सामना करना पड़ेगा।

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