बिलक़ीस बानो केस: अपराधियों की रिहाई पर गुजरात सरकार को कोई पछतावा नहीं

बिलक़ीस बानो केस: अपराधियों की रिहाई पर गुजरात सरकार को कोई पछतावा नहीं

बिलक़ीस बानो सामूहिक बलात्कार के आरोपियों की रिहाई गुजरात सरकार की बदनामी का कारण बना हुआ है और उनकी रिहाई के बाद रोज़ नयी नयी बातें खुल कर सामने आ रही हैं, हिन्दू-मुस्लिम ,औरत-मर्द, सभी ने आरोपियों की रिहाई पर गुजरात सरकार की खुलकर आलोचना की है।

गुजरात सरकार ने आरोपियों की रिहाई के लिए जो तर्क दिया था वह और भी हास्यास्पद था और किसी के गले नहीं उतर रहा, और तरह तरह के प्रश्न उठ रहे हैं। किसी बलात्कारी को अच्छे आचरण के कारण कैसे छोड़ा जा सकता है? क्या अच्छा आचरण बलात्कार जैसे जघन्य अपराध को धो देता है? क्या हर बलात्कारी को उसके अच्छे आचरण के कारण छोड़ दिया जाएगा?

सुप्रीम कोर्ट के हलफनामे में गुजरात सरकार ने अपराधियों की रिहाई का बचाव करते हुए कहा कि उनके अच्छे व्यवहार के कारण कानून के मुताबिक रिहाई हुई और केंद्रीय गृह मंत्रालय ने भी अनुमति दी थी। गुजरात सरकार ने जो हलफ़नामा दिया उसने ये साबित कर दिया कि आरोपियों की रिहाई अकारण नहीं बल्कि एक सोची समझी रणनीति का हिस्सा थें, और इसमें राज्य सरकार से ज़्यादा केंद्र सरकार की मर्ज़ी शामिल थी ,और इस रिहाई ने महिला सुरक्षा के नारों की धज्जियां उड़ा कर रख दी हैं।

इन अपराधियों को न केवल रिहा किया गया, बल्कि उनका स्वागत भी किया गया। गुजरात दंगों के दौरान बिलक़ीस बानो सामूहिक बलात्कार मामले में दोषी पाए गए 11 दोषियों की रिहाई पर गुजरात सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपना जवाब दाखिल किया है। गुजरात की भाजपा सरकार को इन अपराधियों की रिहाई पर कोई पछतावा नहीं है इसी लिए उसने अपने इस फैसले का जोरदार तरीक़े से बचाव किया है।

गुजरात सरकार का हलफनामा

गुजरात सरकार ने अपने हलफनामे में कहा कि इसी साल मई में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला किया था कि 1992 में बनी पुरानी नीति को इन लोगों की रिहाई के लिए लागू किया जा सकता है. इस पॉलिसी में 14 साल जेल में बिताने के बाद आजीवन कारावास से रिहाई की सुविधा है। सरकार ने कहा कि जेल में सभी अपराधियों का व्यवहार अच्छा था। जेल में उनकी कोई शिकायत नहीं थी। सभी पुरुष 14 साल से अधिक समय से जेल में थे और उनकी रिहाई पर विचार करना आवश्यक था। इस मामले में गुजरात सरकार ने केंद्रीय गृह मंत्रालय से भी अनुमति ली थी।

गुजरात सरकार ने इस मामले में जनहित याचिका दायर करने वालों पर कड़ा रोष जताया और कहा कि इस मामले में जनहित याचिका दायर करना कानून का दुरुपयोग है. कानून किसी बाहरी व्यक्ति को ऐसे आपराधिक मामले में दखल देने का अधिकार नहीं देता है। गुजरात सरकार ने अपने ऊपर लगे ऐसे आरोपों का खंडन किया है, जिसमें कहा जा रहा है कि बिलकिस बानो के दोषियों को ‘आजादी का अमृत महोत्सव’ कार्यक्रम के तहत रिहा कर दिया गया है। सरकार ने कहा कि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुसार पूरी कानूनी प्रक्रिया का पालन करते हुए रिहाई की गई है। सरकार ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता राजनीतिक दलों से जुड़े हुए हैं और किसी भी याचिकाकर्ता का इस मामले से कोई सीधा संबंध नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई

मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस अजय रस्तोगी और जस्टिस रवि कुमार की बेंच ने निर्देश दिया कि गुजरात सरकार की ओर से दाखिल जवाब, सभी पक्षों को उपलब्ध कराया जाए. याचिकाकर्ताओं को गुजरात सरकार द्वारा दायर हलफनामे पर अपना जवाब दाखिल करने के लिए भी समय दिया गया है। गौरतलब है कि याचिका में गुजरात सरकार के फैसले को चुनौती दी गई है। याचिका में कहा गया है कि पूरे मामले की जांच सीबीआई की निगरानी में हुई, इसलिए गुजरात सरकार दोषियों को सजा से छूट देने का एकतरफा फैसला नहीं ले सकती।

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