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हाईकोर्ट में 15 दस्तावेज दिखाने के बाद भी नहीं साबित कर पाए भारतीय नागरिकता

गुवाहाटी: असम से एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने नागरिकता से जुड़े दस्तावेजों और उनकी कानूनी वैधता पर एक बार फिर बहस छेड़ दी है। गुवाहाटी हाईकोर्ट ने एक दिहाड़ी मजदूर की भारतीय नागरिकता संबंधी याचिका खारिज कर दी, जबकि उसने अपनी नागरिकता साबित करने के लिए कुल 15 दस्तावेज अदालत के समक्ष प्रस्तुत किए थे।

याचिकाकर्ता ने दावा किया था कि वह जन्म से भारतीय नागरिक है। इसके समर्थन में उसने कई पुराने और सरकारी दस्तावेज पेश किए। इनमें 1951 की राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) में उसके पिता का नाम, 1951 की कंप्यूटरीकृत NRC, 1966 से 2015 तक की प्रमाणित मतदाता सूचियां, वर्ष 1973 का भूमि खरीद दस्तावेज, 2017 का स्कूल प्रमाणपत्र, पैन कार्ड तथा वोटर आईडी (EPIC) सहित अन्य रिकॉर्ड शामिल थे।

हालांकि, हाईकोर्ट ने इन दस्तावेजों को नागरिकता साबित करने के लिए पर्याप्त और कानूनी रूप से स्वीकार्य नहीं माना। अदालत ने कहा कि प्रस्तुत रिकॉर्ड में कई गंभीर विसंगतियां थीं। दस्तावेजों में उम्र, गांव के नाम और परिवार के सदस्यों के नामों में अंतर पाया गया, जिससे दावों की विश्वसनीयता प्रभावित हुई।

अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि पैन कार्ड और वोटर आईडी अपने आप में भारतीय नागरिकता का प्रमाण नहीं हैं। ये दस्तावेज पहचान या कर संबंधी उद्देश्यों के लिए जारी किए जाते हैं, लेकिन नागरिकता निर्धारित करने के लिए इनकी कानूनी हैसियत अलग है।

कोर्ट ने यह भी कहा कि नागरिकता से जुड़े मामलों में केवल दस्तावेज प्रस्तुत करना पर्याप्त नहीं होता, बल्कि उनके बीच स्पष्ट और विश्वसनीय संबंध स्थापित करना भी आवश्यक है। यदि रिकॉर्ड में विरोधाभास या आवश्यक कानूनी कड़ी का अभाव हो, तो ऐसे दस्तावेज नागरिकता साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं माने जा सकते।

यह फैसला ऐसे समय आया है जब असम में NRC और नागरिकता से जुड़े मुद्दे लंबे समय से संवेदनशील बने हुए हैं। माना जा रहा है कि यह निर्णय भविष्य में इसी प्रकार के मामलों में एक महत्वपूर्ण कानूनी संदर्भ के रूप में देखा जा सकता है।

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